जो पीच्छी-कमंडलधारी हो और जो राग द्वेष  से रहित परम दिगम्बर हो,जसे मेरे गुरुवर श्री प्रतीक सागर जी महाराज /

सच्चाई यह है कि ;
१.हमारा प्रत्येक क्षण और कदम  शमशान की ओर बढ़ रहा है,मृत्यु पल -पल निकट आ रही हैं और हम सोचते हैं कि हम तो आगे की ओर बढ़ रहे हैं,यह कैसी  विडंबना हैं /हमें अभी गंभीरता से विचार करके अपने आतम - कल्याण को सँवारने में लग जाना होगा /
२.क्या अभी अकेले में शांत मन से ध्यान दिया हैं कि वो क्या चीज हैं,जिसके निकलते ही हमारा सबसे प्यारा साथी,यह शारीर भी सिर्फ एक मांस का लाथोडा बनकर रह जाता हैं ओर सारी जमा की गयी सामाग्री हंसती हैं कि बेचारे ने जमा करने में सारी दुर्लभ मनुष्य योनी ही गवा दी /इस पर हमें जरा ठन्डे दिमाग से सोचना होगा /
प्रतीकसागर जी हमें हर समय  समझाते ,हम फिर भी समज न पाते हैं /   
यह कैसा मोह राग हमारा ,हम फिर -फिर गलती करते जाते /./