Vishwakarma Puja

  • Date: Sunday, 17 September 2017
  • Event: Vishwakarma Puja

 

विक्रम सम्वत् 2074   आश्विन कृ. द्वादशी                                      17th September 2017

विश्वकर्मा पूजन

श्री विश्वकर्म प्रभु वन्दऊँ, चरणकमल धरिध्य़ान ।

श्री, शुभ, बल अरु शिल्पगुण, दीजै दया निधान ।।

 

सतयुग का 'स्वर्ग लोक', त्रेता युग की 'लंका', द्वापर की 'द्वारिका' और कलयुग के 'हस्तिनापुर' आदि के रचयिता विश्वकर्मा की पूजा अत्यन्त शुभकारी है। सृष्टि के प्रथम सूत्रधार, शिल्पकार और विश्व के पहले तकनीकी ग्रन्थ के रचयिता भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं की रक्षा के लिये अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण किया। विष्णु को चक्र, शिव को त्रिशूल, इंद्र को वज्र, हनुमान को गदा और कुबेर को पुष्पक विमान विश्वकर्मा ने ही प्रदान किये थे। सीता स्वयंवर में जिस धनुष को श्रीराम ने तोड़ा था, वह भी विश्वकर्मा के हाथों बना था। जिस रथ पर निर्भर रह कर श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन संसार को भस्म करने की शक्ति रखते थे उसके निर्माता विश्वकर्मा ही थे। पार्वती के विवाह के लिए जो मण्डप और वेदी बनाई गई थी,वह भी विश्वकर्मा ने ही तैयार की थी। विश्वकर्मा शिल्पशास्त्र के आविष्कारक और सर्वश्रेठ ज्ञाता माने जाते हैं जिन्होनें देवताओं के सम्पूर्ण विमानों की रचना की और जिनके द्वारा आविष्कार कर शिल्पविद्याओं के आश्रय से सहस्रों शिल्पी मनुष्य अपने जीवन निर्वाह करता है।

 

भगवान विश्वकर्मा की पूजा और यज्ञ विशेष विधि-विधान से करना चाहिए। इस दिन प्रातः स्नान आदि करने के बाद पत्नी के साथ पूजा स्थान पर बैठे। इसके बाद विष्णु भगवान का ध्यान करनें के बाद हाथ में पुष्प, अक्षत लेकर- ॐ आधार शक्तपे नम: और ॐ कूमयि नम:, ॐ अनन्तम नम:, ॐ पृथिव्यै नम: कहकर चारों ओर अक्षत छिड़के और पीली सरसों लेकर चारों दिशाओं को बांधे । अपने हाथ में रक्षासूत्र बांधे तथा पत्नी को भी बांधे। पुष्प जल पात्र में छोड़े। इसके बाद हृदय में भगवान विश्वकर्मा का ध्यान करें। रक्षा दीप जलाये, जल के साथ पुष्प एवं सुपारी लेकर संकल्प करें। शुद्ध भूमि पर अष्टदल (आठ पंखुड़ियों वाला) कमल बनाए। उस स्थान पर सात अनाज रखे। उस पर मिट्टी और तांबे का जल डाले। इसके बाद पंचपल्लव (पाँच पेड़ो के पत्ते), सात प्रकार की मिट्टी, सुपारी, दक्षिणा कलश में डालकर कपड़े से कलश का ढ़क दें। चावल से भरा पात्र समर्पित कर ऊपर विश्वकर्मा भगवान की मूर्ति स्थापित करें और वरुण देव का आह्वान करें। पुष्प चढ़ाकर कहें - हे विश्वकर्मा जी, इस मूर्ति में विराजिए और मेरी पूजा स्वीकार कीजिए। इस प्रकार पूजन के बाद विविध प्रकार के औजारों और यंत्रों आदि की पूजा कर हवन यज्ञ करें। धन-धान्य और सुख-समृद्धि की अभिलाषा रखने वाले पुरुषों को भगवान विश्वकर्मा की पूजा करना आवश्यक और मंगलदायी है।

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