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तुलसी विवाह : महात्म्य व पूजा विधान

Wednesday, 24 May 2017 12:40

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तुलसी विवाह पूजा समय

द्वादशी तिथि प्रारंभ - 04:12 से 22 नवम्बर 2015

द्वादशी तिथि समापन - 01:16  तक 23 नवम्बर 2015

संदीप कुमार मिश्र : हमारा देश भारत संस्कारों का देश है,आस्थाओं का देश है,तीज-त्योहारों का देश है भारत।जहां के कण कण ईश्वर का वास कहा जाता है।दीपावली के बारहवें दिन यानि कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को हमारे देश में देवोत्थान, तुलसी विवाह एवं भीष्म पंचक एकादशी के रूप में मनाया जाता है।कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को तुलसी पूजन का उत्सव पूरे भारत वर्ष में मनाया जाता है।हमारे धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि कार्तिक के पावन महिने में जो साधक,भक्त मां तुलसी का विवाह भगवान से करवाते हैं, उनके पिछलों जन्मो के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।

शास्त्रों में कहा गया है कि देवशयनी एकादशी के दिन से ही सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु विश्रामावस्था यानि अपने शयनकक्ष में शयन करने चले जाते हैं। इसी दिन से किसी भी शुभ कार्य जैसे शादी-व्याह,व्रत,नए घर में प्रवेश जैसे समस्त मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है।लेकिन जब  देवउठनी एकादशी की तिथि से भगवान के जागने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है तभी से हमारी सनातन संस्कृति में समस्त मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाती है।और इसी दिन से सभी शुभ कार्य, विवाह, उपनयन जैसे संस्कार शुभ मुहूर्त देखकर प्रारंभ किए जाते हैं।

आषाढ़ मास से लेकर कार्तिक मास तक के समय को हिन्दू धर्म में चातुर्मास कहा गया हैं। इन चार महीनों में भगवान विष्णु क्षीरसागर की अनंत शैय्या पर शयन करते हैं, जिसकारण कृषि के अलावा विवाह जैसे समस्त शुभ कार्य इस समय तक बंद कर दिए जाते हैं। क्योंकि ये चार मास भगवान की निद्राकाल के माने जाते हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सूर्य के मिथुन राशि में आने पर भगवान श्री हरि विष्णु शयन करते हैं और तुला राशि में सूर्य के जाने पर भगवान शयन कर उठते हैं। भगवान जब सोते हैं, तो चारों वर्ण की विवाह, यज्ञ आदि सभी क्रियाएं संपादित नहीं होती। यज्ञोपवीतादि संस्कार, विवाह, दीक्षा ग्रहण, यज्ञ, नूतन गृह प्रवेश, गोदान, प्रतिष्ठा एवं जितने भी शुभ कर्म हैं, वे शास्त्रोक्त चातुर्मास में त्याज्य माने गए हैं। आषाढ शुक्ल एकादशी को देव-शयन हो जाने के बाद से प्रारम्भ हुए चातुर्मास का समापन तक शुक्ल एकादशी के दिन देवोत्थान-उत्सव होने पर होता है।

भगवान विष्णु के स्वरुप शालिग्राम और माता तुलसी के मिलन का पर्व तुलसी विवाह हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है।श्रीमद्भगवत पुराण के अनुसार वर्णित कथा के अनुसार तुलसी को पूर्व जन्म में जालंधर नामक दैत्य की पत्नी बताया गया है। जालंधर नामक दैत्य के अत्याचारों से त्रस्त होकर भगवान विष्णु ने अपनी योगमाया से जालंधर का वध किया था।पति जालंधर की मृत्यु से पीड़ित तुलसी पति के वियोग में तड़पती हुई सती हो गई। इसके भस्म से ही तुलसी के पौधे का जन्म हुआ। तुलसी की पतिव्रता एवं त्याग से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने तुलसी को अपनी पत्नी के रूप में अंगीकार किया और वरदान भी दिया जो भी तुम्हारा विवाह मेरे साथ करवाएगा वह परमधाम को प्राप्त करेगा। इसलिए देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए तुलसी विवाह का प्रचलन है।

हिन्दू शास्त्रों में कहा गया है कि नि:संतान दंपत्ति को जीवन में एक बार तुलसी का विवाह करके कन्यादान का पुण्य अवश्य प्राप्त करना चाहिए क्योंकि तुलसी विवाह करने से कन्यादान के समान पुण्यफल की प्राप्ति होती है। कार्तिक शुक्ल एकादशी पर तुलसी विवाह का विधिवत पूजन करने से भक्तों को मनोवाछित फल की प्राप्ती होती हैं।सनान धर्म में तुलसी को देवी रुप में हर घर में पूजा जाता है। इसकी नियमित पूजा से व्यक्ति को पापों से मुक्ति तथा पुण्य फल में वृद्धि होती है।पूजा पद्धति के अनुसार सभी प्रकार की पूजाओं में देवी तथा देवताओं को तुलसी जी अर्पित की जाती है।कहते हैं प्रतिदिन तुलसी जी में जल देने और उनकी पूजा करने से साथ ही घर मे तुलसी स्थापना वातावरण को सुखमय तथा स्वास्थ्यवर्धक बनाती है।तुलसी के पौधे को पवित्र और पूजनीय माना गया है।तुलसी विवाह के सुअवसर पर व्रत रखने का बड़ा ही महत्व है।

तुलसी विवाह : पूजन विधि

भगवान विष्णु को चातुरमास की योग-निद्रा से जगाने के लिए घण्टा ,शंख,मृदंग आदि वाद्यों की मांगलिक ध्वनि के बीच ये श्लोक पढ़कर जगाते हैं-

उत्तिष्ठोत्तिष्ठगोविन्द त्यजनिद्रांजगत्पते।

त्वयिसुप्तेजगन्नाथ जगत् सुप्तमिदंभवेत्॥

उत्तिष्ठोत्तिष्ठवाराह दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे।

हिरण्याक्षप्राणघातिन्त्रैलोक्येमङ्गलम्कुरु॥

जो साधक संस्कृत बोलने में असमर्थ हों,वे सामान्य रुप से -उठो देवा, बैठो देवा कहकर श्रीनारायण को उठाएं और प्रार्थना करें।

श्रीहरिको जगाने के पश्चात् तुलसी विवाह के लिए तुलसी के पौधे का गमले को गेरु आदि से सजाकर उसके चारों ओर ईख (गन्ने) का मंडप बनाकर उसके ऊपर ओढऩी या सुहाग की प्रतीक चुनरी ओढ़ाते हैं। रंगोली बनाते हैं।गमले को साड़ी में लपेटकर तुलसी को चूड़ी पहनाकर उनका श्रंगार करते हैं। तत्पश्चात तुलसी के पौधे को अर्ध्य दे कर  शुद्ध घी का दीया जलाना चाहिए।धूप, सिंदूर, चंदन लगाना चाहिए।

श्री गणेश जी सहित सभी देवी-देवताओं का विधिवत पूजन करने के साथ ही श्री तुलसीजी एवं शालिग्रामजी  का षोडशोपचारविधि से पूजा करनी चाहिए। पूजन के करते समय तुलसी मंत्र तुलस्यै नम: का जाप अवश्य करना चाहिए।जिसके बाद ऋतुफल और नैवेद्य यानि भोग निवेदित करना चाहिए।ततपश्चात पुष्प अर्पित करने चाहिए।

इसके बाद एक नारियल दक्षिणा के साथ टीका के रूप में रखें। भगवान शालिग्राम की मूर्ति का सिंहासन हाथ में लेकर तुलसीजी की सात परिक्रमा कराएं। जैसे विवाह में जो सभी रीति-रिवाज होते हैं उसी तरह तुलसी विवाह के सभी कार्य किए जाते हैं। विवाह से संबंधित मंगल गीत भी गाए जाते हैं।आरती के पश्चात विवाहोत्सव पूर्ण किया जाता है।

ऐसे तो हिन्दू धर्म शास्त्रों में तुलसी पूजा करने के कई विधान दिए गए हैं।उनमें से एक तुलसी नामाष्टक का पाठ करने का विधान दिया गया है।क्योंकि तुलसी जी को कई नामों से संबोधित किया जाता है। जिनमे मुख्यत: आठ नाम प्रमुख हैं-

नामाष्टक पाठ

वृन्दा वृन्दावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी.

पुष्पसारा नन्दनीच तुलसी कृष्ण जीवनी.

एतभामांष्टक चैव स्तोत्रं नामर्थं संयुतम.

य: पठेत तां च सम्पूज सौsश्रमेघ फलंलमेता..

कहते हैं जो व्यक्ति तुलसी नामाष्टक का नियमित पाठ करता है, उसे अश्वमेघ यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। कार्तिक माह में कहा गया है कि नामाष्टक का पाठ अवश्य ही करना चाहिए। तमाम धर्मावलंबी गृहस्थ आज के दिन उपवास रखते हैं और कहते हैं कि इस एकादशी में रातभर जागकर हरि नाम-संकीर्तन करने से भगवान विष्णु अत्यन्त प्रसन्न होते हैं।

तुलसी विवाह महिमा

पद्मपुराण के उत्तरखण्ड में कहा गया है कि एकादशी-माहात्म्य के अनुसार श्री हरि-प्रबोधिनी यानि देवोत्थान एकादशी का व्रत करने से एक हजार अश्वमेध यज्ञ तथा सौ राजसूय यज्ञों के बराबर फल मिलता है। इस परम पुण्य प्रदायक एकादशी के विधिवत व्रत से सब पाप नष्ट और भस्म हो जाते हैं, इस एकादशी के दिन जो भी भक्त श्रद्धा के साथ जो कुछ भी जप-तप, स्नान-दान, होम करते हैं,वह सब अक्षय फलदायक हो जाता है।कहते हैं कि  समस्त सनातन धर्मी का आध्यात्मिक कर्तव्य है कि देवउठवनी एकादशी का न्रत अवश्य करें। इस व्रत को करने वाला दिव्य फल प्राप्त करता है।

तुलसी जी की आरती

तुलसी महारनी नमो-नमो,

हरि कि पटरानी नमो-नमो

धन तुलसी पुरन तप कीनो शालिग्राम बनी पटरानी

जाके पत्र मंजर कोमल, श्रीपति कमल चरण लपटानी

धूप-दीप -नवेध आरती , पुष्पन कि वर्षा बरसानी

छप्पन भोग ,छत्तीसो व्यंजन ,बिन तुलसी हरि एक ना मानी

सभी सुखी मैया, तेरो यश गावे , भक्ति दान दीजै महारानी

नमो-नमो तुलसी महरानी ,

नमो-नमो तुलसी महारानी।।

 http://sandeepaspmishra.blogspot.in/2015/11/blog-post_60.html

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