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शारदीय नवरात्र 2017- चौथा दिन माँ कूष्माण्डा की पूजा विधि और विधान

Wednesday, 20 September 2017 07:07

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संदीप कुमार मिश्र: शक्ति की आराधना के चौथे दिन नवरात्र में कूष्माण्डा देवी की पूजा का विधान है।माता के चौथे स्वरुप का नाम कूष्माण्डा है।कहा जाता है कि जब सृष्टि की रचना नहीं हुई थी,उस समय अंधकार का साम्राज्य था, तब देवी कुष्मांडा द्वारा ब्रम्हांड का जन्म होता है। देवी कूष्माण्डा का निवास सूर्यमण्डल के मध्य में है और यह सूर्य मंडल को अपने संकेत से नियंत्रित रखती हैं।देवी कूष्माण्डा की महिमा अपरंपार है।

अष्टभुजाओं वाली देवी कूष्माण्डा अपने हाथों में क्रमश: कमण्डलु,  धनुष,  बाण,  कमल का फूल,  अमृत से भरा कलश,  चक्र और गदा व माला लिए हुए हैं। माता की वर मुद्रा भक्तों को सभी प्रकार की ‘ऋद्धि-सिद्धि’  प्रदान करने वाली होती है। सिंह पर सवार देवी अपने भक्तों की सहज रक्षा करती हैं। मां कूष्मांडा की आराधना से भक्तों के समस्त  प्रकार के  कष्ट रोग, शोक संतापों का अंत होता है तथा दिर्घायु एवं यश मिलता है।

माँ कूष्माण्डा की पूजा निम्न मंत्रो के साथ नवरात्र के चौथे दिन करनी चाहिए-

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और कूष्माण्डा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।

माँ कूष्माण्डा की पूजा विधि और सरल विधान

मां कूष्माण्डा की पूजा भी पहले की तीन देवियों की तरह ही करनी चाहिए साथ ही व्रत, पूजन का संकल्प लेकर वैदिक एवं सप्तशती मंत्रों के द्वारा मां कूष्माण्डा सहित समस्त स्थापित देवी देवताओं की षोडशोपचार पूजा करनी चाहिए।

 

ध्यान

वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥

भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥

पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥

प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्।कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादि विनाशनीम्।जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

जगतमाता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

 

त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहिदुःख शोक निवारिणीम्।परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाभ्यहम्॥

http://sandeepaspmishra.blogspot.in/2017/09/2017_95.html

 

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