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विजयादशमी:भारतिय संस्कृति का महापर्व

Tuesday, 16 October 2018 07:32

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संदीप कुमार मिश्र: दशहरे का उत्सव यानी शक्ति और शक्ति का समन्वय समझाने वाला उत्सव।नवरात्रि के नौ दिन जगतजननी मां जगदम्बा की उपासना करके शक्तिशाली बना हुआ साधक विजय प्राप्ति के लिए नाच उठे।यह बिल्कुल स्वाभाविक है इस दृष्टि से देखने पर दशहरे  का उत्सव अर्थात विजय के लिए प्रस्थान का उत्सव।हमारी भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक है,शौर्य की उपासक है,व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया।एक तरफ जहां नवरात्र के समापन पर पुरे देशभर में भक्त मां जगत जननी जगदम्बा के प्रतिमाओं का विसर्जन करते हैं तो वहीं दूसरी तरफ दशहरे का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाते हैं।कहते हैं प्राचीन काल में राजा-महाराजा इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण-यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे।

कलष- पूजा- हवन- मिटटी- मंत्र- मूर्ति- अर्चना- अराधना- साधना- त्याग- तपस्या और उपवास की पावन परंपरा का नाम है नवरात्र। और इसी नवरात्री की पूर्णाहुति का दिन है विजयादशमी।शौर्य का यह पावन पर्व विजयादशमी,नौ दिनों की नवरात्र के उमंग के इस दिन को दशहरा भी कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि आश्विन शुक्लदशमी को तारा उदय होने के समय ‘विजय’ नामक मुहूर्त होता है।यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक माना जाता है।

सनातन धर्म के वैदिक ग्रंथों में कहा गया है कि जीव और जीवन का आश्रय, इस धरा को बचाए रखने के लिए युगों युगों से देव और दानवों में ठनी रहीं। देवता जो कि कल्याणकारी, धर्म- मर्यादा और भक्तों के रक्षक हैं तो वहीं दानव इसके विपरित इसी क्रम में जब रक्तबीज, महिशासुर जैसे अत्याचारियों ने जीवन का आश्रय इस पावन धरा और फिर इसके रक्षक देवताओं को पीड़ित करने लगे।तो देवगणों ने एक अद्भुत “शक्ति का सृजन कर उन्हें अपने अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये।सभी अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित माता का स्वरूप अद्भुत था।एक अद्भुत तेज,एक अद्भुत चमक,दस भुजाएं,त्रिनैना,सिंह पर सवार।जिनका जन्म हुआ था समस्त ब्रह्माण्ड की रक्षा के लिए।भक्तों की रक्षा और देव कल्याण के लिए भगवती दुर्गा ने नौ दिनों में नौ रूपों अर्थात् जयंती, मंगला, काली, भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा, स्वधा को प्रकट किया। जो नौ दिनों तक महाभयानक युद्ध कर शुम्भ-निशुंभ, रक्तबीज और महिशासुर जैसे अनेकों दैत्यों का संहार कर भू और देवलोक में नवचेतना, कल्याण, ओज,तेज,साहस,प्राण और रक्षा शक्ति का संचार कर दिया।

सदियों से आश्विन मास के “शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला यह त्यौहार संकेतात्मक तौर पर कर्इ परंपराओं को अपने साथ जीवंत बनाए रखा है। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों....काम, क्रोध,लोभ,मोह,मद,मत्सर,अहंकार,आलस्य,हिंसा और चोरी के परित्याग की हमें सद्प्रेरणा प्रदान करता है।

दशहरा यानी विजयादशमी भगवान राम की विजय दिवस और दुर्गापूजा दोनों ही रूपों में “शक्ति पूजा का यह पावन पर्व है।तमाम “शास्त्रों को धारण किये माँ की इन मूर्तियों से हमारी संस्कृति में “शास्त्रों की पूजा को प्रधानता मिली और “शायद यही कारण है कि इस दिन “शस्त्रों की पूजा करना “शुभ माना गया है।

यह एक ऐसी पावन तिथि है ... जिसका हमारे जीवन में बहुत महत्व है। यही वो दिन है जब श्री रामचन्द्रजी महाराज ने “शारदीय नवरात्रि पूजा का प्रारंभ समुद्र तट पर किया और उसके बाद दसवें दिन लंका पर विजय प्राप्त की। तभी से ये दिन बन गया असत्य पर सत्य, अधर्म पर धर्म की जीत का दिन। इस दिन भगवान् राम ने दुष्ट रावण का अंत कर अपनी भार्या जगत जननी माता सीता को मुक्त कराया और पृथ्वीवासीयों, देवताओं को राक्षसों के अत्याचार से भयहीन किया।

आश्विन “शुक्ल पक्ष की दसवीं तिथि को विजयदशमी का त्यौहार पूरे देश में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है।देश के हर हिस्से में, हर जगह, अलग-अलग भाषाओं में राम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान के जीवनी पर आधारित नाट्य कार्यक्रम किये जाते हैं।कलाकार राम, लक्ष्मण और रावण का स्वरूप बनाकर रामलीलाओं में जगह-जगह रावण वध का प्रदर्शन करते है।खुले मैदानों में रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले तैयार कर खड़े किये जाते हैं। ये पुतले रंगीन कागज, लकड़ी, बांस और भूसे से बनाये जाते हैं और इन पुतलों के भीतर पटाखे भर दिये जाते हैं और दशमी के संध्या को बड़ी धूम-धाम से ढ़ोल नगाड़ो के साथ पुतलों पर आग वाले तीर चलाये जाते हैं। बड़ी संख्या में लोग एकत्रित हो कर इस रोमांचकारी दृश्य का आनंद लेते हैं।

दुर्गा दशमी या विजयदशमी मां के पूजन का दसवां दिन होता है।इस दिन देवी अपराजिता की पूजा की जाती है और देवी दुर्गा की प्रतिमा को नदी, तालाब या सरोवरों में विसर्जित किया जाता है। तो वहीं दूसरी ओर विजय दशमी के रूप में भगवान् राम की विजय की ख़ुशी में रावण के पूतले का दहन किया जाता है....

 हमारा देश आस्थाओं का देश है।यहां हर एक त्योहार को बड़े ही श्रद्धा भाव के साथ मनाया जाता है। दशहरा यानी कि विजयादशमी राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा के रूप में दोनों ही रूपों में यह “शक्ति पूजा का पर्व है।शस्त्र पूजन की तिथि है,यह पर्व है हर्ष का,उल्लास का,अधर्म पर धर्म के विजय का।देश के कोने-कोने में यह उत्सव विभिन्न रूपों से मनाया तो जाता ही है।साथ ही साथ दूसरे देशों में भी जहाँ भारतीय प्रवासी रहते हैं।इसे उतने ही जोश और उल्लास के साथ मनाया जाता है।

अपनी संस्कृति और विरासत के लिए मशहूर बंगाल में दशहरा का अर्थ है-दुर्गा पूजा जो चार दिनों तक मनाया जाने वाला यह उत्सव यहां के लागों के लिए खासा महत्व रखता है।ये चार दिन सप्तमी,अष्टमी, नवमीं और दशमी के नाम से जाने जाते हैं।दसवां दिन अर्थात् मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन का दिन।इस दिन यहां माता की प्रतिमाओं की भव्य झांकियां निकाली जाती है।विवाहित महिलाएं मां को सिंदूर लगाने के साथ-साथ अन्य महिलाओं को भी सिंदूर लगाती हैं।जिसे यहां ‘सिंदूर खेला’ कहा जाता है साथ ही  बड़े धूम-धाम से ढ़ाक के साथ लोग नाचते गाते हैं और ये पावन उत्सव मनाते है। 

उड़ीसा और असम में भी चार दिनों तक मां दूर्गा की पूजा की जाती है।यहां लोग देवी दुर्गा को सुशोभित पंडालों में विराजमान करते हैं। यहां की सभी परम्पराएं लगभग बंगाल से मिलती जुलती ही होती हैं।

गुजरात में मिट्टी सुशोभित रंगीन घड़े को देवी की प्रतीक मान कर अविवाहित लड़कियां उसे सिर पर रखकर एक लोकप्रिय नृत्य करती हैं। जिसे गरबा कहा जाता है। यह नृत्य यहां की “शान है। पुरुष और स्त्रियां दो छोटे रंगीन डंडों को संगीत की लय पर आपस में बजाते हुए घूम-घूम कर नृत्य करते हैं। जिसे डांडिया भी कहा जाता है।

गुजरात में एक ओर जहां गरबा की धूम रहती है।तो वहीं दूसरी ओर तामिलनाडु, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक में दशहरा नौ दिनों तक चलता है।जिसमें तीन देवियां लक्ष्मी,सरस्वती और दुर्गा की पूजा की जाती है।प्रथम तीन दिनों तक सुख-समृद्धि प्रदायिणी माता लक्ष्मी की,उसके बाद के तीन दिनों तक विद्यादायिणी मां सरस्वती की और अंतिम तीन दिनों तक “शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा की पूजा की जाती है।

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में भी अन्य स्थानों की भांति ही लगभग एक सप्ताह पूर्व ही इस पर्व की तैयारी शुरू हो जाती है।यहां इस उत्सव का प्रारम्भ श्री रधुनाथ जी की वंदना से ही होती है।यहां के लोग सामूहिक रूप से नगर के मुख्य स्थानों से होते हुए नगर की परिक्रमा करते हैं।

पंजाब में दशहरे के दिन मेहमानों का स्वागत मिठार्इ और उपहारों से किया जाता है। जगह-जगह रावण के पूतले जलाए जाते हैं,साथ ही कर्इ स्थानों पर मेले का आयोजन भी किया जाता है।

महाराष्ट्र में नवरात्र के नव दिन समर्पित है माँ दुर्गा को।जबकि दसवें दिन वंदना की जाती है मां सरस्वती की। किसी भी शुभ कार्य के शुरूआत के लिए इस दिन को यहां अति शुभ माना जाता है। लोग इस दिन यहां विवाह, गृह-प्रवेश और नये घर खरीदने के लिए अत्यन्त शुभ मानते है।

कश्मीर के अल्पसंख्यक हिन्दू नवरात्रि के पर्व को बड़े श्रद्धा से मनाते हैं।लोग यहां नौ दिनों तक माता खीर भवानी के दर्शन को जाते हैं।ऐसा माना जाता है कि यदि कोर्इ अनहोनी होने वाली होती हैं तो सरोवर का पानी काला हो जाता है।

दोस्तों दशहरे का सांस्कृतिक पहलू भी है।यह एक पर्व एक ही दिन अलग-अलग जगह भिन्न-भिन्न रुपों में मनाया जाता है।लेकिन फिर भी एकता देखने योग्य होती है। आश्विन शुक्ल दशमी को विजयादशमी कहा जाता है ।विजय के संदर्भ में इस दिन को दशहरा, विजयादशमी इत्यादि नामों से जाना जाता है जो कि साडे तीन मुहूर्तों में से एक है।दुर्गा नवरात्रि की समाप्ति पर यह दिन आता है। इसलिए इसे `नवरात्रिका समाप्ति-दिन' भी मानते हैं।

मित्रो एक मनुष्य जब अपनी पूरी गरिमा के साथ, पूरी मर्यादा के साथ, अपने पूरे स्वभाव के साथ उपस्थित होता है तो वह राम है। राम हमारी सभ्यता संस्कृति के एक ऐसे आदर्श है, जिसने प्रेम, सत्यता और कर्तव्य के अनोखे प्रतिमान स्थापित किए। जिसके सामने आज सदियों बाद भी सम्पूर्ण भारतीय जनमानस नतमस्तक है।प्रभू श्री राम आप की सभी मनोंकामनाओं को पुरा करें।हमारी तो यही कामना है कि शक्ति की उपासना का ये पावन पर्व नवरात्र और विजयादशमी आपके जीवन में हर प्रकार की सफलता लेकर आए।आप नितनई उंचाईयों का वरण करे।साथ ही समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वाह करें।

 

।।जय श्री राम।।

 

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