एक सूक्ष्म परिचय

अखिलब्रह्माण्डनायक परब्रह्म, लीलापुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण की परम पावन क्रीड़ास्थली श्रीधामवृन्दावन में, सतत् निवास करने वाले आध्यात्मिक जगत के देदीप्यमान सूर्य की भाँति जन-जन के मानस पटलपर छाये प.पू. भागवत भूषण पं. श्रीनाथ शास्त्री, पुराणाचार्य जी के यशस्वी सुपौत्र व शिष्य, परम गौ सेवाव्रती डॉ. श्रीकृष्णकुमारजी शर्मा जी के चिरञ्जीवी तथा वात्सल्य की प्रतिमूर्ति प्रभुमाँ (नानीजी) की गोद में “कन्हैया” व प.पू.ब्रह्मालीन स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज द्धारा “प्रणव” नामकरण का सौभाग्य प्राप्त भागवतकिंकर श्री अनुरागकृष्ण शास्त्री “श्रीकन्हैयाजी” श्रीमद्भागवत कथा क्षेत्र के देदीप्यमान नक्षत्र हैं।

आपका जन्म वसन्त पञ्चमी के अगले दिन षष्ठी को १०/०२/१९८१ को मातुलगृह राजनांदगाँव में हुआ। आपसे बड़ी एक बहन है, जो कोलकाता में सपरिवार रहती है । एक छोटी बहन, जो अपने श्वसुरालय जयपुर में रहती है। आपकी बाल्यावस्था सामान्य बच्चों की अपेक्षा अधिक चञ्चलता से ओतप्रोत थी। शायद नटखट कन्हैया की छाया पड़ी थी । इसीलिए आज भी आत्मीयगण आपको “कन्हैया”नाम से ही पुकारते हैं।

आपकी प्रारम्भिक व माध्यमिक शिक्षा मथुरा, वृन्दावन से हुई तथा स्नातक में आपने बी.बी.ए. आगरा विश्वविद्मालय से किया। दिल्ली से टॉफिल की शिक्षा प्राप्त कर आपने कॅम्ब्रिज विश्वविद्मालय से एम.बी.ए की शिक्षा ग्रहण की। परन्तु; पूज्य दादागुरुजी की आज्ञा से उसे मध्य में ही छोड़ अपना सर्वस्व जीवन, पूर्ण रुपेण भागवत को ही समर्पित कर दिया। स्नातकोत्तर की शिक्षा पूर्ण न हो पाने के कारण आपको कुछ अधूरापन लगने लगा । अतः आपने आगरा विश्वविद्मालय से पी.जी.डी.सी.ए. एवं ऑफिस मैनेजमेंट का कोर्स प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण किया। साथ ही काशी सम्पूर्णानन्द विश्वविद्मालय से शास्त्री की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की।

प्रबन्घ की उच्च शिक्षा से सुसज्जित आपने अपनी सनातन संस्कृति की धरोहर गूढ़ दर्शन शास्त्र, भागवत का अनुशीलन तथा संस्कृत अध्ययन को ही अपने जीवन का पाथेय बना लिया । सूट-बूट एवं टाई की जगह धोती कुर्ता ने ले ली। आप मनोयोग से भागवत तथा संस्कृत भाषा के अध्ययन में डूब गए तथा “मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुःखं न च सुखम्” की सूक्ति चरितार्थ हुई।

रामायण,गीता, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र आदि पर अध्ययन करते हुए श्रीदादागुरुजी का आपको पग-पग पर दिशा निर्देश मिलता रहा। अर्थ तथा गूढ़ रहस्य समझने के लिए विद्धानों, सन्तों की कमी नहीं थी। श्रीदादागुरुजी रूपी ज्ञान गंगा स्वयं घर में ही बह रही थी। आवश्यकता थी तो केवल लगन, निष्ठां एवं परिश्रम की । तो आपने कुछ ही वर्षो में निर्मल ज्ञान रुपी गंगा जल से अपने जीवन को भिगो लिया। अब इसे निखारना, तराशना तथा अनुभव की कसौटी पर परीक्षण करना था। ये कार्य आप अब भी निरन्तर कर रहे हैं। आपकी आज भी यही विचार धारा है की“स्वाध्यायान्मा प्रमद”

संवत २०६१ चैत्र नवरात्र में मौन उपवास के साथ श्री गिरिराज गोवर्धनकी तलहटी में उन्ही के निःस्पृह प्राण स्वरूप सन्त पं.श्री गयाप्रसादजी महाराज के आध्यात्मिक विग्रह के समक्ष श्रीमद्भागवत महापुराण का संस्कृत वाचन कर परमपूज्य श्रीरामदासजी “काकाजी” की सन्निधि में आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त कर, तथा तदुपरान्त ०८ अगस्त २००४ से प.पू. कार्ष्णि स्वामी श्रीगुरुशरणानंद जी महाराज के शुभाशीष की छाया में अष्टोत्तरशत (१०८) श्रीमद्भागवत महापुराण के भव्य आयोजन द्धारा कथा यात्रा प्रारम्भ की। स्वयं स्वामीपाद ने कहा कि लगता ही नहीं यह प्रथम कथा वाचन है। तदनन्तर श्रीदादागुरुजी की आज्ञानुसार वृन्दावन के संत श्रीहरिबाबा के बांध धाम तीर्थ पर अपनी वाणी पुष्प के माध्यम से श्रीमद्भागवत कथा समर्पित की। सन २००५ में “भागवत सेवा संस्था” के नाम से एक न्यास का गठन किया जिसके अन्तर्गत शिक्षा के क्षेत्र में सन 1964 से चल रहे भागवत विद्मालय का संचालन करना स्वीकारा, जो कि वर्तमान में वैदिक यात्रा गुरुकुल के नाम से वेद, वेदाङ्गों,कर्मकाण्ड, ज्योतिष, व्याकरण, दर्शन, संगीत आंग्लभाषा व कम्पूटर आदि की शिक्षा प्रदान कर रहा है।

आपका भाव समुद्र व कथा शैलीहृदय स्पर्शी हैं, जिनमें करुणा का प्रभाह है। शब्दाडम्बर नहीं है। आपकी कथा में श्रोता ही गद्गद् होकर नहीं रोते बल्कि वक्ता स्वयं भाव विभोर होकर अश्रु प्रवाह से आप्लावित हो जाते हैं। कथा वाचन के समय आपकी दशा देखकर सन्त प्रवर डोंगरे जी महाराज की स्मृति जागृत हो जाती है। कभी स्व.श्री हरिवंश राय बच्चन जी की कविताओं या मैथिली शरण गुप्त जी की गंभीर पंक्तियों के माध्यम से अथवा सरल उदाहरणों के द्धारा कठिन से कठिन शास्त्रों के भाव को बड़ी सरलता से प्रत्येक श्रोता के ह्रदयपरल तक पहुंचा देते हैं।

आपको भारत में अनेक तीर्थों में अपनी वाणी पवित्र करने का सुयोग प्राप्त हुआ। हरिद्धार, ऋषिकेश, जगन्नाथपुरी, उज्जैन, काशी, बद्रीनाथ, वृन्दावन आदि अनेक तीर्थस्थलों में आपने अपने करुणाभाव को वाणी के माध्यम से गति दी है। न केवल भारत वसुन्धरा की पावन धरा पर, अपितु सिंगापुर, मलेशिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड, यूरोप, पैरिस, मॉरिशस आदि देशों में भी आपने सनातन शास्त्रध्वज को फहराया। आपने श्रीमद्भागवत महापुराण, श्रीदेवीभागवत, श्रीरामचरितमानस, श्रीहनुमान कथा, भक्तिमती मीरा चरित्र, नारदभक्ति सूत्र आदि विषयों पर चर्चा कर अपनी वाणी को पवित्र करते हुए भक्ति का प्रकाश जन-जन के हृदय तक पहुँचाया। एक बात जो मैंने बाहरी मिलने वाले व्यक्तियों से सुनी है कि आप धार्मिक समाजसेवी संस्थाओं, गौशालाओं या मानव सेवा में लगी संस्थाओं से स्वयं अपने लिए कोई मूल दक्षिणा नहीं लेते। यदि कोई अतिशय निवेदन कर के दे भी तो श्री युगलसरकार की आज्ञा से उसी या अन्य किसी सेवा भावी संस्था में वह सेवा स्वतन्त्र भाव से समर्पित कर देते हैं। यह एक अद्भुत एवं अनुकरणीय विचार लगा इसलिये इसका उल्लेख करना मैंने उचित समझा। आपका जीवन भागवत प्रेम में समर्पित एक अत्यंत सुन्दर यात्रा है । भगवच्चरणारविन्द में सर्वात्म समर्पण का भाव आप अपने प्रवचनों एवं कथा के माध्यम से अक्सर देते हैं, कुछ कदम उस यात्रा में सम्मिलित होने का…..

 

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