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मित्रता कैसी हो..?

Wednesday, 24 May 2017 07:27

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संदीप कुमार मिश्र : “सुंदर प्रतिभा,बाह्य सौंदर्य स्वच्छंद प्रकृति आदि कुछ बातें देखकर ही मित्रता की जाती है।परन्तु जीवन संग्राम में साथ देने वाले मित्रों में इससे कुछ अधिक ही होना चाहिए।मित्र केवल उसे नहीं कहते,जिसके गुणों की तो हम प्शंसा कर सकें पर जिससे स्नेह न कर सके,जिससे अपने छोटे-छोटे काम निकालते जाएं पर जिससे अन्दर से घ्रृणा करते रहें।

मित्र सच्चे पथ प्रदर्शक के समान होना चाहिए...जिसे हम अपना प्रीति पात्र बना सकें तथा जिस पर हम पूरा-पूरा विश्वास कर सके।हमारे मित्रों के बीच सच्ची सहानुभूति होनी चाहिए।ऐसी सहानुभूति जिससे एक के हानि लाभ को दूसरा अपना समझे।जो स्वेच्छा से एक-दूसरे के साथ तन-मन से हो,जिसमें अपने आपको देखा जा सके,जिसके सामने अपने भावनाओं को खोला जा सके।

हमारे बुरे मित्र उस साये के समान होते हैं जो धूप में तो साथ- साथ चलते हैं परन्तु अंधेरे में साथ छोड़ देते हैं।

मित्रता के लिए दोनो का एक कार्य से जुड़ा होना या समान रुची होना बी आवस्यक नहीं है,प्रकृति या आचरण में समानता हो ये भी वांछनीय नहीं ।

राम धीर और शान्त प्रकृति के थे,वहीं लक्ष्मण उग्र प्रकृति के थे परन्तु दोनों में प्रगाढ़ स्नेह था।

मित्र का कर्तव्य इस प्रकार बताया गया है-किसी भी बुराई से अपने साथी को आगाह करना तथा बचाना और उच्च तथा महान कार्यों में इस प्रकार सहायता देना,मन बढ़ाना और साहस दिलाना कि मित्र अपने सामर्थ्य से भी बाहर कार्य कर जाए।

आपके पास जो भी,जितनी भी प्रतिभा ,क्षमता और योग्यता है उसका पूरा-पूरा उपयोग कीजिए।अपने प्रयास में कहीं कोई कमी मत छोड़िए,नहीं तो बाद में मात्र पछताना ही शेष रह जाएगा।

मित्रता का मतलब है त्याग, बलिदान,और दूसरों की खुशी।

दोस्तों कुसंग का ज्वर सबसे भयानक होता है,यह केवल नीति और सदवृत्ति का ही नाश नहीं करता,बल्कि बुद्धि का भी क्षय करता है,किसी युवा पुरुष की संगति यदि बुरी होगी तो उसके पैर में बंधे चक्की के समान होगी जो उसे दिन-प्रतिदिन अवनति के गड्ढे में गिराती जाएगी और यदि अच्छी होगी तो सहारा देने वाली के मान होगी जो उसे निरंतर उन्नति की ओर उठाती जाएगी। इसलिए सदैव अच्छे लोगों की संगति करनी चाहिए।सोच-समझ कर और परख कर।यदि कोई मित्र तुम्हारा बूरा हुआ तो निश्चय ही तुममे बुराई प्रवेश करेगी,अपना हमेसा ध्यान रखें,जिससे कि आप हर बुराई,दुर्गुणों से बचे रहें। ऐसा ही पं.रामचंद्र शुक्ल मित्रता के संबंध में कहा करते थे।

 

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