नवरात्रि पर करते हैं दुर्गासप्तशती का पाठ तो सही विधि विधान जाने ज्योतिर्विद पं. शिव कुमार शुक्ल जी से...

 

-: ऊं नमश्चण्डिकायै :-

धर्म डेस्क: माँ दुर्गा की आराधना का महापर्व नवरात्रि।ऐसे में माता के भक्त बड़े ही भक्ति भाव के साथ माता की साधना आराधना पूजा पाठ करते हैं साथ ही व्रत रहते हैं।नवरात्रि में माता दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए और अपनी मनोवांछित कामनाओं को पूरा करने के लिए दुर्गासप्तशती का पाठ भी करते हैं।ऐसे में पाठ की सही विधि और विधान क्या है ये जानना बेहद जरुरी है।क्योंकि पाठ में किसी भी प्रकार की त्रुटी गलत परिणाम दे सकती है।

जगत जननी माँ जगदम्बा की अराधना, साधना एवं पूजन,स्तुति,पाठ करने या कराने वाले साधक के पुत्र-पुत्रादि,सन्तति इस धराधाम पर सुख पूर्वक तब तक विद्यमान रहते हैं, जब तक पहाड़ वन, कानन और कानन से युक्त यह पृथ्वी टिकी हुई हैं,एवं पंचभौतिक शरीर के नष्ट होने पर वह साधक महामाया भगवती दुर्गा की असीम अनुकम्पा से देव दुर्लभ स्थान अर्थात मोक्षपद को प्राप्त करता है।

यावद् भूमण्डलं धत्ते स-शैल-वनकानन ।

तावतिष्ठति मेदिन्यां सन्तति: पुत्र-पौत्रिकी ।।

देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम् ।

प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामाया-प्रसादत: ।।

दुर्गा ‌जी का पाठ करने और कराने की विधि :-

ज्योतिर्विद पं. शिव कुमार शुक्ल जी कहते हैं कि विद्वान पंडित और संस्कार से युक्त कुलीन पंडित से ही दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए, यजमान या ब्राह्मण अपने अन्दर श्रद्धा, विश्वास और धर्म परायण होकर मां दुर्गा ‌जी की पूजा कराएं, जगत जननी मां बहुत ही दयालू हैं। मां का हजारों ‌और असंख्य रूप है, जिस मनोकामना से साधक पाठ करते या करवाते हैं, माँ उनकी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करती है।

पंडितों का सर्वभाव :-

पहला : असत्य नहीं बोलें ।

दूसरा : किसी भी यजमान या किसी और की निन्दा न करें ।

तीसरा : किसी को अश्लील भाषा, चंचलता से दूर रहने का प्रयास करें ।

विद्वान पंडित पाठ से पहले पांच सूत्रों का ख्याल रखें

पहला : हस्तें पुस्तकं न धारयेत ।

हाथ में पुस्तक को लेकर ना पढ़े ।

दूसरा : अध्याय प्राप्य विरामेन्न तु मध्ये कदाचन् ।

अध्याय के बीच में विराम नहीं होना चाहिए ।

तीसरा : कृते विरामे मध्ये तु अध्यायादि पठेत्पुन:।

चौथा : ग्रथार्थ बुधयमान :।स्पष्टक्षरे नाति शीघ्रं नातिमंदं।रसभावस्वर युक्तं वाचयेत्।

पाठ शीध्र न पढ़ा जाय, न मन में पढ़ा जाय, रसभाव के साथ पढ़ा जाए।

पांचवां : पाठ के अन्त में इति, वध, अध्याय और समाप्त का प्रयोग ना किया जाए ।

इति बोलने पर लक्ष्मी हरण ।

वध बोलने पर कुल विनाश

अध्याय बोलने पर प्राण हरण हो जाता है।

अध्याय के समाप्त पर हांथ में जल लेकर बोलें-

ऊं जय जय मार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके देवी महात्म्ये प्रथम: ऊं तत्सत् ।

सत्या: सन्तु मम् कामा:

श्रीजगदम्बार्पणमस्तु ।

दुर्गाशप्तशती पाठ तीन रूप से किया जाता है-

१ - नित्य, २ - निमित्तिक, ३ - कामा पाठ

दुर्गाशप्तशती में 535 श्लोक ,108 अर्धश्लोक,  57 उवाच। दुर्गाशप्तशती में पूरे 700 मंत्र है।

पाठ करने और कराने की विधि :-

साधक स्वयं पाठ करें या किसी विद्वान से करवाएं उसके लिए इस क्रम में विधिनुसार पाठ प्रारंभ करवा सकते हैं। सबसे पहले दिशा शुद्धि करें, आचमनी, शुद्धिकरण, स्वस्ति वाचन, संकल्प, गणेश-गौरी का पूजन करें और फिर कलश स्थापना करके षोडश मातृका, सप्तधृतिका, सर्वतोभद्र बनाएं।इसके बाद नवग्रह शांति की पूजा अर्चना, मां दुर्गा की या मूर्ति की पूजा षोडशोपचार विधि से करें या करवाएं।

पुस्तक का मंत्र :

ऊं नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।

नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणता: स्म् ताम् ।।

इस मंत्र को बोलने के बाद दुर्गा पाठ का संकल्प लेकर पाठ साधक को शुरू करना चाहिए।

यथा सर्व मंत्रेषु बीज शक्ति कीलकानां प्रथममुच्चारणं तथा सप्तशतीपाठ अपि कवच, अर्गला

कीलकानां प्रथमं पाठ: स्यात् ।

इस प्रकार अनेक तन्त्रों के अनुसार सप्तशती पाठ का क्रम अनेक प्रकार का उपलब्ध होता है।ऐसी दशा में पाठ का जो क्रम पूर्व परम्परा से प्रचलित हो उसी का अनुसरण करना अच्छा है।

नवरात्रि हवन विधि

साधक यदि दुर्गासप्तशती का पाठ नवरात्रि के शुभ अवसर पर करवाते हैं तो समिधा नौ दिन का नौ किलो समिधा होनी चाहिए।इसी प्रकार से शत् ‌चण्डी, लख चण्डी, सहस्त्र चण्डी पाठ के दशांश हवन तर्पण और मार्जन होना चाहिए।उसके बाद आरती करें और विसर्जन करें।

हवन का कार्य सम्पन्न होने के बाद कन्या का पैर प्रक्षालन,वस्त्र, पात्रों में भोजन और आरती साधक को करनी चाहिए साथ ही, द्रव्य, फल, मिष्ठान्न ‌और चन्दन भी कन्यारुपी देवी को करना चाहिए।

यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्

माँ भगवती की कृपा आप सभी पर सदैव बनी रहे,जीवन में माँ खुशियां और शांति लेकर आएं।जय माता दी।। ज्योतिर्विद पं. शिव कुमार शुक्ल

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