मार्गशीर्ष अमावस्या के दिन साल का अंतिम सूर्य ग्रहण : जानिए महत्व,पूजा-विधि विधान

 

धर्म डेस्क-हिन्दू पंचांग के अनुसार साल में 12 अमावस्या होती हैं।अमावस्या के दिन जप-तपध्यान और देवी-देवताओं का पूजन किया जाए तो जीवन से सभी प्रकार की नकारात्मकताएं खत्म होती है ।इस दिन 108 बार तुलसी की परिक्रमा करने से मन को शांति की अनुभूति होती है। जो साधक आध्यात्मिक मार्ग पर बढ़ना चाहते हैं उनके लिए भी यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। सोमवार के दिन होने के कारण इसे सोमवती मार्गशीर्ष अमावस्या भी कहा जाता है। इसलिए सोमवती अमावस्या में किए जाने वाले सभी कार्य इस दिन किए जा सकते है। यह दिन पितृ दोष शांति के लिए विशेष रुप से प्रयोग किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस अवसर पर पवित्र नदियों में स्नानदोष शांति और तर्पण करना कल्याणकारी और पुण्यकारी होता है।

मार्गशीर्ष अमावस्या शुभ मुहूर्त

दिसंबर 14, 2020 को 00:46:54 से अमावस्या आरम्भ

दिसंबर 14, 2020 को 21:48:26 पर अमावस्या समाप्त

हिन्दू पंचांग के अनुसार यह अमावस्या मार्गशीर्ष माह में आती हैइसे अगहन अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन पितरों की शांति के लिए तर्पणस्नानदान-धर्म आदि कार्य किये जाने का विधान है। मार्गशीर्ष अमावस्या पर देवी लक्ष्मी का पूजन करना भी शुभ माना जाता है।

मार्गशीर्ष अमावस्या व्रत और पूजा विधि

पितरों के तर्पण के लिए मार्गशीर्ष अमावस्या का बड़ा महत्व है। इस दिन व्रत,पितरों का पूजन करने से पितरों का आशीर्वाद मिलता है। इस दिन होने वाले धार्मिक कर्म इस प्रकार हैं-

  प्रातःकाल किसी पवित्र नदीतालाब या कुंड में स्नान करें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। स्नान के बाद बहते हुए जल में तिल प्रवाहित करें और गायत्री मंत्र का पाठ करें।

  कुल परंपरा के अनुसार भगवान विष्णु या भगवान शिव का पूजन करें।

  नदी के तट पर पितरों के निमित्त तर्पण करें और उनके मोक्ष की कामना करें।

  मार्गशीर्ष अमावस्या का व्रत रखने वाले व्यक्ति को इस दिन जल ग्रहण नहीं करना चाहिए।

  पूजा-पाठ के बाद भोजन और वस्त्र आदि का यथाशक्ति किसी जरुरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को दान करें।

सत्यनारायण भगवान की पूजा

मार्गशीर्ष अमावस्या के दिन पितरों की आत्म शांति और उनकी कृपा पाने के लिए पूजा-पाठ और व्रत रखा जाता है और भगवान सत्यनारायण की पूजा भी की जाती है। और हलवे का भोग लगाया जाता है। भगवान सत्यनारायण की कथा का पाठ करने के बाद पूजा संपन्न होती है और श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का बांटा जाता है।

मार्गशीर्ष अमावस्या का महत्व

प्रत्येक अमावस्या की भांति मार्गशीर्ष अमावस्या पर भी पितरों को तर्पण करने का विधान हैअतः इस दिन किये जाने वाले पूजा-पाठ से पितरों को आत्म शांति मिलती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस दिन तर्पण और पिंड दान करने का विशेष महत्व है। मार्गशीर्ष अमावस्या का व्रत रखने से समस्याओं का अंत होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

सूर्य ग्रहण की तारीख और समय

इस बार अमावस्या के दिन ही साल का अंतिम सूर्य ग्रहण भी लग रहा है।इससे पहले 21 जून को सूर्य ग्रहण लगा था। भारत में दिखाई न देने के कारण ग्रहण का सूतक काल मान्य नहीं होगा। सूर्य ग्रहण की शुरुआत 14 दिसंबर की शाम 7 बजकर 03 मिनट से होगी और 15 दिसंबर की रात 12 बजे के करीब समापन बताया जा रहा है। यह सूर्य ग्रहण दक्षिण अमेरिकाअटलांटिक महासागरअफ्रीका आदि देशों में देखा जा सकेगा।

इस प्रकार से मार्गशीर्ष अमावस्या पर धार्मिक अनुष्ठान,स्नान ध्यान और जागरण के साथ पितृ पूजा का महत्व बढ़ जाता है।

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