Kumbh Mela 2021 : 850 साल पुराना कुंभ मेले का इतिहास, कुंभ के बारे में कितना जानते हैं आप ?

 

धर्म डेस्क: हम सब जानते हैं कि नव वर्ष 2021 में कुंभ का मेला हरिद्वार में लगने वाला है।सनातन धर्म में कुंभ के संबंध में कहा जाता है कि धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष की कामना लिए संपूर्ण सनातनी लोग कुंभ मेले में जरुर आते हैं और स्नान,ध्यान,तप साधना करते हैं।ऐसे में क्या आप जानते हैं कि कुंभ का इतिहास कितना प्राचीन है ? या पिर इसकी परंपरा कब से शुरु हुई ?

दरअसल कुंभ मेले का इतिहास कम से कम 850 साल पुराना है। ऐसा माना जाता है कि आदि शंकराचार्य जी ने इसकी शुरुआत की थीलेकिन कुछ कथाओं के अनुसार कुंभ की शुरुआत समुद्र मंथन के आदिकाल से ही हो गई थी। शास्त्रों में ऐसा वर्णित है कि पृथ्वी का एक वर्ष देवताओं का दिन होता हैइसलिए हर बारह वर्ष पर एक स्थान पर पुनः कुंभ का आयोजन होता है। देवताओं का बारह वर्ष पृथ्वी लोक के 144 वर्ष के बाद आता है। ऐसी मान्यता है कि 144 वर्ष के बाद स्वर्ग में भी कुंभ का आयोजन होता है इसलिए उस वर्ष पृथ्वी पर महाकुंभ का अयोजन होता है। महाकुंभ के लिए निर्धारित स्थान प्रयाग को माना गया है।

ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर कुंभ मेला -

कहा जाता है कि कुंभ मेले का शुरुआत समुद्र मंथन से जुड़ी हुई है। कहते हैं कि एकबार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण जब इंद्र और देवता कमजोर पड़ गएतब राक्षस ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया था। जिसके बाद त्राहिमाम करते हुए समस्त देवता भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उन्हें पूरी बात बताई थी। तब भगवान विष्णु ने देवताओं को दैत्यों के साथ मिलकर क्षीर सागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी। भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर संपूर्ण देवता राक्षसों के साथ संधि करके अमृत निकालने के प्रयास में लग गए।

समुद्र मंथन से अमृत निकलते ही देवताओं के इशारे पर इंद्र पुत्र 'जयंतअमृत कलश को लेकर आकाश में उड़ गया। राक्षसों ने अमृत लाने के लिए जयंत का पीछा किया और कठिन परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ा और अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव और दानव में 12 दिन तक भयंकर युद्ध होता रहा।

मंथन में निकले अमृत का कलश हरिद्वारइलाहबादउज्जैन और नासिक के स्थानों पर ही गिरा थाइसीलिए इन चार स्थानों पर ही कुंभ मेला हर तीन बरस बाद लगता आया है। 12 साल बाद यह मेला अपने पहले स्थान पर वापस पहुंचता है। यही कारण है कि कुंभ के मेले को इन्हीं चार स्थानों पर मनाया जाता है। कुंभ को हिस्सों में बांटा गया है। जैसे अगर पहला कुंभ हरिद्वार में होता है तो ठीक उसके साल बाद दूसरा कुंभ प्रयाग में और फिर तीसरा कुंभ साल बाद उज्जैन मेंऔर फिर साल बाद चौथा कुंभ नासिक में होता है।

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