गीता ज्ञान से समस्याओं का समाधान || भाग-1

 

पैकेज- ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय....मित्रों संसार का दूसरा नाम मोह है...जहां मनुष्य की आशाएं,अपेक्षाएं और आकांक्षाएं खूब बड़ी बड़ी होती हैं...जिन्हे पूरा करने के लिए इन्सान अनवरत प्रयासों में लगा हुआ है...किसी को सफलता मिलती है तो किसी को निराशा हाथ लगती है...और यही जीवन है...हमारे ऋषि मनीषियों नें जीवन के इन्हीं समस्याओं से बाहर निकालने के अनेकानेक रास्ते बताए और जीवन में सुक और आनंद का मार्ग प्रशस्त किया....

आईए आज हम गीता ज्ञान से समस्याओं का समाधान के पहले भाग में    श्रीमद्भगवद गीता के श्लोकों मे छुपे हुए उन सूत्रों के बारे में जानते है जिससे  जीवन की हर परेशानी का होगा समाधान........

 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।

अर्थ----- भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन। कर्म करने में तेरा अधिकार है। उसके फलों के विषय में मत सोच। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो और कर्म न करने के विषय में भी तू आग्रह न कर।

जीवन सूत्र--- भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन से कहना चाहते हैं कि मनुष्य को बिना फल की इच्छा से अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा व ईमानदारी से करना चाहिए। यदि कर्म करते समय फल की इच्छा मन में होगी तो आप पूर्ण निष्ठा से साथ वह कर्म नहीं कर पाओगे।

निष्काम कर्म ही सर्वश्रेष्ठ परिणाम देता है। इसलिए बिना किसी फल की इच्छा से मन लगाकर अपना काम करते रहो। फल देनान देना व कितना देना ये सभी बातें परमात्मा पर छोड़ दो क्योंकि परमात्मा ही सभी का पालनकर्ता है।

योगस्थ: कुरु कर्माणि संग त्यक्तवा धनंजय।

सिद्धय-सिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।

अर्थ--- हे धनंजय (अर्जुन)। कर्म न करने का आग्रह त्यागकरयश-अपयश के विषय में समबुद्धि होकर योग युक्त होकरकर्म कर, (क्योंकि) समत्व को ही योग कहते हैं।

जीवनसूत्र--- धर्म का अर्थ होता है कर्तव्य।धर्म के नाम पर हम अक्सर सिर्फ कर्मकांडपूजा-पाठतीर्थ-मंदिरों तक सीमित रह जाते हैं। हमारे ग्रंथों ने कर्तव्य को ही धर्म कहा है।

भगवान कहते हैं कि अपने कर्तव्य को पूरा करने में कभी यश-अपयश और हानि-लाभ का विचार नहीं करना चाहिए। बुद्धि को सिर्फ अपने कर्तव्य यानी धर्म पर टिकाकर काम करना चाहिए। इससे परिणाम बेहतर मिलेंगे और मन में शांति का वास होगा।

मन में शांति होगी तो परमात्मा से आपका योग आसानी से होगा। आज का युवा अपने कर्तव्यों में फायदे और नुकसान का नापतौल पहले करता हैफिर उस कर्तव्य को पूरा करने के बारे में सोचता है। उस काम से तात्कालिक नुकसान देखने पर कई बार उसे टाल देते हैं और बाद में उससे ज्यादा हानि उठाते हैं।

 

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।

न चाभावयत: शांतिरशांतस्य कुत: सुखम्।

अर्थ--- योग रहित पुरुष में निश्चय करने की बुद्धि नहीं होती और उसके मन में भावना भी नहीं होती। ऐसे भावना रहित पुरुष को शांति नहीं मिलती और जिसे शांति नहींउसे सुख कहां से मिलेगा।

जीवन सूत्र--- हर मनुष्य की इच्छा होती है कि उसे सुख प्राप्त होइसके लिए वह भटकता रहता है।लेकिन सुख का मूल तो उसके अपने मन में स्थित होता है। जिस मनुष्य का मन इंद्रियों यानी धनवासनाआलस्य आदि में लिप्त हैउसके मन में भावना (आत्मज्ञान) नहीं होती।

जिस मनुष्य के मन में भावना नहीं होतीउसे किसी भी प्रकार से शांति नहीं मिलती और जिसके मन में शांति न होउसे सुख कहां से प्राप्त होगा।अत: सुख प्राप्त करने के लिए मन पर नियंत्रण होना बहुत आवश्यक है।

 

विहाय कामान् य: कर्मान्पुमांश्चरति निस्पृह:।

निर्ममो   निरहंकार  स  शांतिमधिगच्छति।।

अर्थ---- जो मनुष्य सभी इच्छाओं व कामनाओं को त्याग कर ममता रहित और अहंकार रहित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करता हैउसे ही शांति प्राप्त होती है।

जीवन सूत्र ---यहां भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन में किसी भी प्रकार की इच्छा व कामना को रखकर मनुष्य को शांति प्राप्त नहीं हो सकती।

इसलिए शांति प्राप्त करने के लिए सबसे पहले मनुष्य को अपने मन से इच्छाओं को मिटाना होगा।

हम जो भी कर्म करते हैंउसके साथ अपने अपेक्षित परिणाम को साथ में चिपका देते हैं। अपनी पसंद के परिणाम की इच्छा हमें कमजोर कर देती है। वह ना हो तो व्यक्ति का मन और ज्यादा अशांत हो जाता है।

मन से ममता अथवा अहंकार आदि भावों को मिटाकर तन्मयता से अपने कर्तव्यों का पालन करना होगा। तभी मनुष्य को शांति प्राप्त होगी। ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय।

 

 शेष अगले भाग में......

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