गीता ज्ञान से समस्याओं का समाधान || भाग-2

 

पैकेज- ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय.... आईए आज हम गीता ज्ञान से समस्याओं का समाधान के दूसरे भाग में श्रीमद्भगवद गीता के श्लोकों मे छुपे हुए कुछ और जरुरी सूत्रों के बारे में जानते है जिससे जीवन की हर परेशानी का होगा समाधान........

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।

कार्यते ह्यश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:।।

अर्थ--- कोई भी मनुष्य क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। सभी प्राणी प्रकृति के अधीन हैं और प्रकृति अपने अनुसार हर प्राणी से कर्म करवाती है और उसके परिणाम भी देती है।

जीवन सूत्र--- बुरे परिणामों के डर से अगर ये सोच लें कि हम कुछ नहीं करेंगे तो ये हमारी मूर्खता है।खाली बैठे रहना भी एक तरह का कर्म ही हैजिसका परिणाम हमारी आर्थिक हानिअपयश और समय की हानि के रूप में मिलता है।

सारे जीव प्रकृति यानी परमात्मा के अधीन हैंवो हमसे अपने अनुसार कर्म करवा ही लेगीऔर उसका परिणाम भी मिलेगा ही। इसलिए कभी भी कर्म के प्रति उदासीन नहीं होना चाहिए।अपनी क्षमता और विवेक के आधार पर हमें निरंतर कर्म करते रहना चाहिए।

 

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण:।

शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मण:।।

अर्थ---- तू शास्त्रों में बताए गए अपने धर्म के अनुसार कर्म करक्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।

जीवन सूत्र---- श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से मनुष्यों को समझाते हैं कि हर मनुष्य को अपने-अपने धर्म के अनुसार कर्म करना चाहिए। जैसे- विद्यार्थी का धर्म है विद्या प्राप्त करनासैनिक का कर्म है देश की रक्षा करना।

जो लोग कर्म नहीं करतेउनसे श्रेष्ठ वे लोग होते हैं जो अपने धर्म के अनुसार कर्म करते हैंक्योंकि बिना कर्म किए तो शरीर का पालन-पोषण करना भी संभव नहीं है। जिस व्यक्ति का जो कर्तव्य तय है।उसे वह पूरा करना ही चाहिए।

 

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।

अर्थ---- श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैंसामान्य पुरुष भी वैसा ही आचरण करने लगते हैं।श्रेष्ठ पुरुष जिस कर्म को करता हैउसी को आदर्श मानकर लोग उसका अनुसरण करते हैं।

जीवनसूत्र---- यहां भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि श्रेष्ठ पुरुष को सदैव अपने पद व गरिमा के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिएक्योंकि वह जिस प्रकार का व्यवहार करेगासामान्य मनुष्य भी उसी की नकल करेंगे। जो कार्य श्रेष्ठ पुरुष करेगासामान्यजन उसी को अपना आदर्श मानेंगे।

उदाहरण के तौर पर अगर किसी संस्थान में उच्च अधिकार पूरी मेहनत और निष्ठा से काम करते हैं तो वहां के दूसरे कर्मचारी भी वैसे ही काम करेंगेलेकिन अगर उच्च अधिकारी काम को टालने लगेंगे तो कर्मचारी उनसे भी ज्यादा आलसी हो जाएंगे।

 

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्म संगिनाम्।

जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्त: समाचरन्।।

 

अर्थ--- ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे किंतु स्वयं परमात्मा के स्वरूप में स्थित हुआ और सब कर्मों को अच्छी प्रकार करता हुआ उनसे भी वैसे ही कराए।

जीवन सूत्र---ये प्रतिस्पर्धा का दौर हैयहां हर कोई आगे निकलना चाहता है। ऐसे में अक्सर संस्थानों में ये होता है कि कुछ चतुर लोग अपना काम तो पूरा कर लेते हैं।लेकिन अपने साथी को उसी काम को टालने के लिए प्रोत्साहित करते हैं या काम के प्रति उसके मन में लापरवाही का भाव भर देते हैं।

श्रेष्ठ व्यक्ति वही होता है जो अपने काम से दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है। संस्थान में उसी का भविष्य सबसे ज्यादा उज्ज्वल भी होता है।

 

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।

मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।

अर्थ--- हे अर्जुन। जो मनुष्य मुझे जिस प्रकार भजता है यानी जिस इच्छा से मेरा स्मरण करता हैउसी के अनुरूप मैं उसे फल प्रदान करता हूं। सभी लोग सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।

जीवन सूत्र--- इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि संसार में जो मनुष्य जैसा व्यवहार दूसरों के प्रति करता हैदूसरे भी उसी प्रकार का व्यवहार उसके साथ करते हैं।

उदाहरण के तौर पर जो लोग भगवान का स्मरण मोक्ष प्राप्ति के लिए करते हैंउन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो किसी अन्य इच्छा से प्रभु का स्मरण करते हैंउनकी वह इच्छाएं भी प्रभु कृपा से पूर्ण हो जाती है। कंस ने सदैव भगवान को मृत्यु के रूप में स्मरण किया। इसलिए भगवान ने उसे मृत्यु प्रदान की। हमें परमात्मा को वैसे ही याद करना चाहिएजिस रुप में हम उसे पाना चाहते हैं।

आप आस्थावान समस्त भगवत प्रेमीजन गीता के इन सूत्रों को जीवन में जरुर अपनाएं जिससे जीवन सुखमय और आनंदमय बन सके। ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय।

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