अकेलेपन से एकांत की ओर ! अकेलापन भय तो एकांत जीवन का आनंद- श्री पुंडरीक गोस्वामी जी महाराज

 

Dharm Desk/tbc : आपके हाथ में है कि आप अकेलेपन में है या एकान्त में हैं। अकेलेपन को भरा जाता है और व्यर्थ कि वस्तुओं को निकालकर जो बचता है वो एकांत है।

अकेलापन stress है अकेलापन depression है अकेलापन Injãity है अकेलापन अधूरापन है। साधु अकेला नहीं होता वो एकान्त में होता है।

एक बात और आप सब अभी तक भीड़ में थे बहुत चीजे आस-पास थी पर उसके बाद भी आप अकेलेपन में थे और उसे फिल करना पड़ता था।

उस अकेलेपन को भरने के लिये मैक़्जीन पढ़ने लगता है मूवीज़ देखने लगता है यू ट्यूब पर चला जाता होगा वो अपने अकेलेपन को भरने में लगा हुआ है।

आप अकेलेपन में है या आप एकान्त में है इस बात का विचार कीजिए।क्योंकि-

अकेलापन डिप्रेशन है

एकान्त डाशीजन है

अकेलापन एक भय है

एकान्त होना आनन्द है

बहुत सी चीजे कही जा सकती है दोनों में बहुत अन्तर है -

अकेलापन आपको बाहर की तरफ दौड़ाता है ।

एकान्त आपको भीतर की तरफ दौड़ाता है।

गुरुदेव कहते- एक ही कान्त हो जाना भी एकान्त है। एक कान्त ही एकान्त है।

हम कई बार अकेलेपन को भी एकान्त समझ लेते हैं। भीड़ में होना आवश्यक नहीं है कि आप एकान्त में है। बहुत सारे लोग भीड़ में होते हुए भी एकान्त में नहीं होते।

अभी तक आप अपने अकेलेपन को भरने के लिये श्रृष्टि खड़ा किया पर आज आपके पास अवकाश है इस परिस्थिति में आनन्द का अनुभव वो कर सकता है जो एकान्त के महत्व को जानता है।

एकान्त का मतलव सहज रूप में समझाया जाय तो आपके जीवन में व्यर्थ वस्तुओं की निवृत्ति एकान्त है।

अकेलेपन में व्यक्ति को ज्यादा बोलने और सुनने की इच्छा होती है पर एकान्त का सबसे पहला प्रमाण है कि वहाँ मौन आनन्द देने लगता है।

एकान्त का स्वरूप मौन है। एकान्त और मौन एक ही स्थिति के दो आयाम है। एक ही वस्तु के दो प्रकार है एक ही स्वभाव की दो आकृतियाँ हैं।

मौनी एकान्त को प्राप्त कर लेता है एकान्ती मौन को प्राप्त कर लेता है।

वैकुण्ठाधिपति भगवान जब क्षीर सागर में आराम करते हैं तो वो अकेले में नहीं एकान्त में होते हैं।

जिसने अपने जीवन में अकेलापन अनुभव किया है वो वनों से शहरों की तरफ भागा है और जिसने अपने जीवन में एकान्त का अनुभव किया वो शहरों से वनों कि तरफ भागने लगता है।

एकान्त को भरने की जरूरत नही होती। जब घड़ा पूरा भर जाय अब उसमें कुछ भरने की गुंजाइश न हो जब कुछ कहने कि गुंजाइश न हो ये स्थिति एकान्त है।

एक और बात आप अकेले पैदा होते हो और आप अकेले मरते हो तो अकेले होना प्रकृति है एकान्त परमेश्वर है।

अकेले तो रहते हो पर सबसे बड़ी साधना ये है कि वो जन्म जो मृत्यु के लिए होती है इसके बीच में आप एकान्त को भर लो।

इस समय जिसने एकान्त को भरा हुआ है न बन्धुओ! वो इसका आनन्द लेगा वो इस परिस्थिति में भी परमानन्द का अनुभव प्राप्त कर लेगा।

अकेलापन भोग कि तरफ ले जाता है एकान्त योग कि तरफ ले जाता है।

जब कोई नहीं होता तब आपको अकेला लगता है

जब कोई आपका नहीं होता तब आपको अकेला लगता है

जब आप किसी के नहीं होते तो शायद आपको अकेला लगता है।

पर सबके होते हुए भी आप एकान्त का अनुभव कर सकते हैं।

अकेलापन आपको क्रोधी बना सकता है

एकान्त आपको प्रेमी बना सकता है

एकान्त का ही आनन्द लेना ध्यान है।

अगर आप कमरे में अकेले बैठे हो तब कोई आ जाए तो आपको सुख का अनुभव होता है पर अगर आप एकान्त में बैठे हो और उस समय कोई आ जाए तो आपको विघ्न का अनुभव होता है।

एकान्त वास्तव में हमारा आत्यंतिक स्वभाव है। वो अन्तः स्वतः रूप से भरा हुआ है।

अकेलेपन को घड़ीभर में भरा जा सकता है और घड़ी भर में खाली किया जा सकता है पर

एकान्त धीरे-धीरे घटता है।

अकेलेपन में उदासी पटकती है अकेलापन दूसरों की याद दिलाता है। एकान्त अपने से परिचय कराता है।

एकान्त ही वो स्थान है जहाँ भगवान मिलते हैं।

भजन वो वस्तु है जो एकान्त तक ले जाती है इसलिए भीड़ में भी ध्यान कर सकते हो भीड़ में भी सुमिरन कर सकते हो भीड़ में भी तुम जप कर सकते हो क्योंकि वो एकान्त तक ले जाता है। 

तुम अपने अकेलेपन को भरने के लिये जो साधन करते हो वो भीड़ में नहीं हो सकती। भजन खुद अकेला करता चला जाता है तो तुम मेले में भी अकेले और अकेले मे भी मेले में होते हो।

हिमालय पर एकान्त मिल सकता है। वृन्दावन में बहुत सारे साधु अकेले है वास्तव में वो एकान्त में है। तुम धीरे-धीरे उस स्थिति का अनुभव करने लगते हो।

एकान्त में आपको कहीं पहुंचना नहीं होता बस पाना होता है। 

अपने अकेलेपन को एकान्त से भर लीजिए।

एक को कान्त बना लीजिए।अनेक का अन्त कर दीजिए।अनन्त कि ओर आइए। अनन्त कि आराधना में लग जाइए। यही उसकी सूक्ष्मतम् वेदना का स्वरूप है।

जब व्यास गादी पर कोई वक्ता बैठता है तो वो अकेला नहीं होता वो एकान्त बैठता है।

तुम कथा में पूरे परिवार के साथ आए या अकेले आए हो पर कथा तुम्हारे अन्तस्चेतना तक उतर सकती है जब तुम एकान्त में बैठ जाते हो।

अकेले होकर एकान्त में या भीड़ में होकर एकान्त में। ये इसका सूक्ष्मतम् स्वरूप है।

एकान्त वास मतलव सबसे दूर रहना नहीं एकान्त का मतलव अपने पास रहना है।

मीरा अकेली नहीं चलती एकान्त में चलती हैं।

गुरु शिष्य को अकेले नहीं छोड़ता एकान्त में छोड़ता है। जब शिष्य एकान्त अनुभव करता है तो वो अपनी साधना को अवकाश देता है।

जीवेर स्वरूप होय नित्य कृष्ण दासयही इसका सूक्ष्म से सूक्ष्मतम् स्वरूप है।

।।परमाराध्य पूज्य श्रीमन्माध्वगौडेश्वर वैष्णवाचार्य श्री पुंडरीक गोस्वामी जी महाराज ।।

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