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हिन्दू धर्म का सप्तक्षेत्र महात्म्य

Monday, 22 May 2017 16:23

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संदीप कुमार मिश्र: कहते हैं धर्मो रक्षति रक्षित: और हिन्दू धर्म में आस्था का विशेष महत्व है।ईश्वर को हमारे हिन्दू धर्म सर्वोपरी माना जाता है।आस्था और विश्वास हमारे यकीन को मजबूती प्रदान करती है।ऐसे में ये जानना भी बेहद खास है कि हमारे हिन्दू धर्म में ईश्वर का निवास स्थान कहां बताया गया है।कहने का मतलब है कि संत महात्माओं,ऋषीयों मुनियों की तपस्थली से लेकर जिन स्थानों पर ईश्वर का वास कहा जाता है उन्हें सप्तक्षेत्र कहा जाता है...इन स्थानों को हमारे हिन्दू धर्म में पवित्र तीर्थ माना जाता हैं।हिन्दू धर्म शास्त्रों में भी इन पवित्र क्षेत्रों का वर्णन मिलता है।आईए जानते हैं कौन से हैं वो क्षेत्र-

1.कुरुक्षे‍त्र

जहां भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया...जहां महाभारत का युद्ध हुआ...वो स्थली है कुरुक्षेत्र..कहा जाता है कि प्रसिद्ध चंद्रवंशी राजा कुरु द्वारा हल चलाकर भूमि को पवित्र कर कुरुक्षेत्र की स्थापना की गई थी। जिसे कुरुजांगल भी कहा जाता था। भागवत में इसे धर्मक्षेत्र कहा गया है। जो हरियाणा राज्य में स्थित है ।

2.हरिक्षेत्र

वराह पुराण में हरिक्षे‍त्र का वर्णन मिलता है।कहते हैं महर्षि पुलस्त्य ने किसी समय यहां तपस्या की थी। इस बात की चर्चा मिलती है कि राजा आदिभरत (जड़भरत)जी ने भी इस स्थान पर रहकर तप किया था। इसे पुलहाश्रम भी कहा जाता है।इस स्थान पर गंगा-सरयू-सोन और गंडकी नदियों का संगम है। यह क्षेत्र पटना के पास स्थित एक तीर्थ है।जो बिहार में है।

3.प्रभास क्षेत्र

स्कंदपुराण के प्रभास खंड में इस क्षेत्र का महात्म्य बताया गया है। यह स्थान हिन्दू अनुयायियों के लिए सबसे पवित्र तीर्थ माना जाता है।द्वारिका से कुछ ही दूर उत्तर में सौराष्‍ट्र में है।शैव के साथ वैष्णव की आस्था यहां ज्यादा है।इसे महान पवित्र तीर्थ कहा जाता है।ऐसा कहा जाता है कि दक्ष प्राजपति के शाप से क्षय रोग से ग्रस्त चंद्रमा ने यहां पर तपस्या कर के रोग से मुक्ति पाई थी।इसी जगह पर भगवान श्रीकृष्ण के चरण में जरा नामक व्याघ ने बाण मारा था। वायुपुराण के अनुसार वेदव्यास जी को कठिन तपस्या के बाद यहीं पर भगवान वेदपुरुष नारायण के विराट स्वरूप के दर्शन हुए थे। यहां का गोपीचंदन अति प्रसिद्ध है।

4.भृगुक्षे‍त्र

नर्मदा और समुद्र के संगम पर स्थित है भृगुक्षेत्र ।जिसे वर्तमान में भड़ोच कहते हैं। प्राचीन समय में इसका नाम जम्बूमार्ग था।इसी स्थान पर राजा बलि ने दस अश्वमेघ यज्ञ सम्पन्न किए थे।महर्षि भृगु द्वारा प्रतिष्ठित यहां का भृग्वीश्वर नामक शिवलिंग आस्था का मुख्य केंद्र है, जो नर्मदा के तट पर भास्कर तीर्थ और द्वादशादित्य तीर्थों के पास है। इस क्षे‍त्र में 55 मुख्‍य तीर्थ हैं। महर्षि भृगु की दीर्घकालीन निवास स्थली तथा तप स्थली के कारण यह भृगुक्षेत्र कहलाता है। महर्षि जमदग्नि और परशुरामजी की भी साधना का ये मुख्य क्षेत्र रहा है।

5. पुरुषोत्तम क्षेत्र

हिन्दू पुराणों,सास्त्रों में पुरुषोत्तम क्षेत्र को विशेष फलदायी बताया गया है।जगन्नाथ धाम भी कहकर इसे संबोधित किया जाता है। चार धामों के वर्णन में इसका विस्तृत महात्म्य बताया गया है ।कहा जाता है कि भगवान विष्णु जब चारों धामों पर बसे अपने धामों की यात्रा पर जाते हैं तो हिमालय की ऊंची चोटियों पर बने अपने धाम बद्रीनाथ में स्नान करते हैं। पश्चिम में गुजरात के द्वारिका में वस्त्र पहनते हैं। पुरी में भोजन करते हैं और दक्षिण में रामेश्‍वरम में विश्राम करते हैं। द्वापर के बाद भगवान कृष्ण पुरी में निवास करने लगे और बन गए जग के नाथ अर्थात जगन्नाथ। पुरी का जगन्नाथ धाम चार धामों में से एक है। जहां पर भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं।आस्थावानों के लिए यह क्षेत्र धामों में धाम कहा जाता है।

6.नैमिषक्षेत्र

तीरथ वर नैमिष विख्याता ।

अति पुनीत साधक सिधि दाता ।।

उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद से लगभग 40 किलोमीटर पूर्व की ओर स्थित है नैमिषक्षेत्र। यह स्वायम्भुव मनु और शतरूपा की तप:स्थली है। आदिगंगा गोमती जिसे धेनुमती भी कहा जाता है, यहां से प्रवाहित होती हैं। चक्रतीर्थ, ललितादेवी शक्तिपीठ, हत्याहरण, मिश्रित तीर्थ आदि अनेक पुण्यप्रद तीर्थ इस क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। नैमिष क्षे‍त्र की परिक्रमा 84 कोश की है।

वाल्मीकि-रामायण में 'नैमिष' नाम का उल्लेख मिलता है। कहा गया है कि श्री राम जी ने गोमती नदी के तट पर अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न किया था-'ऋषियों के साथ लक्ष्मण को घोड़े की रक्षा के लिये नियुक्त करके रामचन्द्र जी सेना के साथ नैमिषारण्य के लिए प्रस्थित हुए।' वहीं महाभारत में युधिष्ठिर और अर्जुन ने इस तीर्थ-स्थल की यात्रा की थी। वैदिक काल में यह तपस्थली एक प्रमुख शिक्षा-केन्द्र के रूप में प्रसिद्ध रही है। पौराणिक मान्यतानुसार नैमिषारण्य 88000 ऋषि-मुनियों के तपस्थली का केंद्र रहा है।

कहा जाता है कि शौनक आदि ऋषियों को सूत जी ने अट्ठारह पुराणों की कथा और मर्म का यही उपदेश दिया था। शान्त और मनोरम वातावरण के कारण यह अध्ययन, मनन और ज्ञानार्जन हेतु एक आदर्श स्थान है।नैमिषारण्य का महत्व आदि काल के सात ही वर्तमान में भी उसी प्रकार है

7.गया क्षेत्र

वायुपुराण, पद्मपुराण तथा अग्नि पुराणों में गया की महिमा बताई गई है। गया में पितरों को पिंड़ दान दिया जाता है। पितर कामना करते हैं कि उनके वंश में कोई ऐसा पुत्र उत्पन्न हो, जो गया जाकर उनका श्राद्ध करे। गया क्षे‍त्र के तीर्थों में फल्गु नदी, विष्णुपद, गयासिर, गयाधर, मंदिर, प्रेतशिला, ब्रह्मकुण्ड, अक्षयवट आदि प्रमुख है। आपको बता दें कि गया का नाम गय नामक असुर के नाम पर पड़ा है।

अंतत: हमारे हिन्दू धर्म में विविधता भरी हुई है,जो इसे और भी विशाल बनाती है,एक दूसरे से जोड़ती है।कहना गलत नहीं होगा कि 'ब्रह्मज्ञान, गयाश्राद्ध, गोशाला में मृत्यु तथा कुरुक्षेत्र में निवास- ये चारों हिन्दू धर्म में मुक्ति के साधन हमारे शास्त्रों में बताये गए हैं। प्राचिन हिन्दू धर्म और धर्म क्षेत्र को कोटिश: नमन।

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