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होलाष्टक में शुभकार्य क्यों हैं वर्जित ?

Monday, 22 May 2017 18:00

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संदीप कुमार मिश्र: सनातन संस्कृति...हिन्दू मान्यता और पौराणिक कथाओं में फाल्गुन शुक्लपक्ष अष्टमी से होलाष्टक तिथि की शुरुआत मानी जाती है।और इस तिथि से पूर्णिमा तक के आठों दिनों को हमारे हिन्दू धर्मानुसार होलाष्टक कहा जाता है।जैसा कि इस वर्ष(2016)में होली से 8 दिन पहले होलाष्टक यानि 16 मार्च से आरंभ हों चुका है। होलाष्टकावधि भक्ति की शक्ति का दिव्य प्रभाव दिखाने की है।

पंडित कपुर चन्द शास्त्री जी कहते हैं कि जब सत्ययुग में हिरण्यकश्यपु ने घोर तपस्या करके भगवान विष्णु से अनेकानेक वरदान प्राप्त किया उसके बाद उसे अहंकार हो गया।और अहंकार के मद में चूर हिरण्यकश्यपु द्वारा चहुंओर अनाचार-दुराचार बढ़ने लगा।ईश्वर की भक्ति करने वालों को सजा दी जाने लगी...ईश्वर भक्तों को यातनाएं दी जाने लगी।जिसे देखकर भगवान् विष्णु से रहा नहीं गया और अपने भक्त हिरण्यकश्यपु के उद्धार के लिए प्रभु ने अपना ही अंश हिरण्यकश्यपु की पत्नी कयाधू के गर्भ में स्थापित कर दिया।जिससे एक दिव्य बालक का अवतार इस धराधाम पर हुआ...जिसका नाम प्रह्लाद था।भक्त प्रह्लाद जन्म से ही ब्रह्मज्ञानी थे।प्रहलाद का हर पल,हर क्षण ईश्वर भक्ति में व्यतीत होने लगा।भक्त प्रहलाद को सभी नौ प्रकार की भक्ति प्राप्त थीं।जो इस प्रकार हैं-

श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पाद सेवनम। अर्चनं वन्दनं दास्यंसख्यमात्म निवेदनम।

कहने का भाव है कि - श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य, व आत्मनिवेदनम।

हरि भक्त प्रह्लाद की भक्ति का उनके पिता हिरण्यकश्यपु सदैव विरोध करते थे।और खुद की भक्ति करने को कहते थे।जिसके लिए भक्त प्रहलाद को ईश्वर की भक्ति से विमुख करने के अनोको उपाय हिरण्यकश्यपु ने किए,लेकिन उनके सभी उपाय निष्फल हो जाते।अंतत: अभिमानवश क्रोधित होकर हिरण्यकश्यपु ने भक्त प्रह्लाद को फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी को ही बंदी बना लिया और मृत्यु हेतु अनेकानेक यातनाएं देने लगे।कहते हैं जिसपर प्रभु की कृपा होती होती है उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता,और वैसा ही हुआ...भक्त प्रह्लाद अपने पिता की घोर यातनाओं से भी तनिक विचलित नहीं हुए।जिसके बाद निरंतर प्रह्लाद को मृत्यु देने के अनेकों उपाय किए जाने लगे,और भाव वत्सल भगवान की कृपा वश बालक प्रहलाद हमेशा बचते रहे। इसी प्रकार सात दिन का समय बीत गए और आठवें दिन जब होलिका को अपने भाई हिरण्यकश्यपु की परेशानी नहीं देखी गई तो उसने अपने भाई को एक उपाय सुझाया।

मित्रों आपको बता दें कि हिरण्यकश्यपु की बहन होलिका को सृष्टी के रचयिता भगवान ब्रह्मा जी द्वारा अग्नि से न जलने का वरदान था।इसी वरदान की वजह से होलिका ने भक्त प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में भस्म करने का प्रस्ताव हिरण्यकश्यपु के सामने रखा।जिसके बाद जब होलिका धधकती अग्नि में जैसे ही अपने भतीजे प्रह्लाद को गोद में लेकर बैठी,वह स्वयं ही धू-धू कर जलने लगी और भगवतकृपा से भक्त प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ।वो मुस्कुराते हुए अग्नि से बाहर निकल आए।।

कहते हैं कि तभी से भक्ति पर आघात हो रहे इन आठ दिनों को जत में होलाष्टक के रूप में मनाये जाने की शुरुआत हुई। मित्रों भक्ति का प्रभाव देखिए...कि जिस-जिस तिथि, वार को भक्ति पर अत्याचार होता था, उन तिथियों और दिन के स्वामी भी हिरण्यकश्यपु से क्रोधित हो जाते थे। इसीलिए इन आठ दिनों में क्रमश: अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध एवं चतुर्दशी को मंगल तथा पूर्णिमा को राहु उग्र रूप लिए माने जाते हैं।तभी से इन आठ दिनों तक किसी भी प्रकार के शुभकार्य हिन्दू धर्म में नही किए जाते हैं।

होलाष्ट में मुख्य रुप से हमें कुछ मुख्य और शुभकार्यों को करने से बचना चाहिए,जैसे- गर्भाधान, विवाह, नामकरण, विद्यारम्भ, गृह प्रवेश और हर प्रकार के निर्माण कार्य जैसे अनुष्ठान इन दिनों सनातन धर्म में अशुभ माने गए हैं। फाल्गुन शुक्ल अष्टमी के दिन से ही होलिकादहन स्थान का चयन किया जाता है। और आठवें दिन यानि पूर्णिमा के दिन सायंकाल शुभ मुहूर्त में अग्निदेव की शीतलता एवं स्वयं की रक्षा के लिए उनकी पूजा करके होलिका दहन किया जाता है।सा ही विधान हमारे धर्म शास्त्रों में बताए गए हैं।जिनका निरंतर सृष्टी पर रहे रहे हिन्दू धर्मानुयायी मानते और पालन करते आ रहे हैं।

 

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