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Wednesday, 10 January 2018 13:13

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संदीप कुमार मिश्र- श्री गोपालभट्ट प्राकट्य स्वयंभू श्रीराधारमण लाल जी की असीम अनुकम्पा से से विगत 456 वर्षो से चली आ रही परंपरा “सेवा महोत्सव” कला, संस्कृति,सद्भाव के संग भाव और भक्ति के माध्यम से बड़े ही सहज भाव के संग परम श्रद्धेय श्री पुण्डरीक गोस्वामी जी ने श्रीराधारमण लाल जू की सेवा करते हुए सेवा महोत्सव को महामहोत्सव में बदल दिया।इस महामहोत्सव में आए हुए देशी विदेशी भक्तों ने भक्तिरस मनें डुबकर खुब आनंद के गोते लगाए।

वृंदावन के सप्त देवालयों में अपनी अलग पहचान बना चुके श्रीराधारमण मंदिर में सेवा और समर्पण की निराली और अद्भूत परंपरा अपनाई जाती है। सेवा महोत्सव में सिर्फ पूजन-अर्चन ही नहीं होता बल्कि गायन, वादन और नृत्य की त्रिवेणी का भी समावेश किया जाता है।

दरअसल श्रीधाम की छटा ही इतनी निराली है की यहां आने वाला यहीं का होकर रह जाता है।कहते हैं कि-

प्रेममयी श्री राधिका,प्रेम सिंधु गोपाल।

प्रेमभूमि वृंदाविपिन,प्रेम रुप ब्रज बाल।

कहने का भाव है कि वृन्दावन में सर्वत्र श्रीराधिका का ही पूर्ण राज्य है।  वह वृन्दावनेश्वरी कहलाती हैं। भुक्ति-मुक्ति की यहां तनिक भी नहीं चलती। धर्म-कर्म भी यहां ‘जेवरी बंटते’ अस्तित्वहीन नजर आते हैं। यहां के मनुष्य ही नहीं; वृक्षों के डाल-डाल और पात-पात पर भी सदा ‘राधे-राधे’ का शब्द गुंजायमान रहता है।

श्रीराधारमण मंदिर की भव्यता सेवा महोत्सव के दौरान देखते ही बनती है।आपको बतातें चलें कि सात दिनों तक चलने वाले इस सेवा महोत्सव में प्रतिदिन श्रीराधारमण जी का भिन्न भिन्न प्रकार से श्रृंगार किया जाता है,अलग असल प्रकार के मिष्ठान का भोग और साथ छप्पन भोग भी लगाया है जो अद्वितिय है

ठाकुर जी की बालस्वरूप में सेवा होने के कारण यहां की सभी सेवाओं में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि हर सेवा ठाकुर जी के मन के भावों के अनुसार ही हो। यही कारण है कि राग, संगीत और भोग सेवा श्रीराधारमण मंदिर का कोई सानी नहीं है।

श्रीराधारमण मंदिर में प्रतिदिन प्रातः से सायंकाल तक हर दर्शन में गायन के माध्यम से वातावरण में जहां भक्ति रस का स्पन्दन दिखाई पड़ता है वहीं मंदिर के कीर्तनिया तरूण दास एवं कृष्णगोपाल शर्मा द्वारा गायन एवं पखावज वादन कर समयानुकूल पद-पदावली का गायन शास्त्रीय शैली में किया जाता है।

श्रीराधारमण जू की मनमोहक छवि यहां आने हर भक्त अपनी आंखों में बसा लेना चाहता है।हर साधक के मन में यही भाव होता है कि ठाकुर जी की कृपा उन पर सदैव बनी रहे और ऐसे भी श्रीराधारमणऩ लाल जू इतने दयालू हैं कि वो अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करते और अपने भक्तों की झोली खुशियों और धन धान्य संपन्नता से भर देते हैं।

यहां पर ये बताना भी आपको बेहद नितांत आवश्यक है कि इस बार सेवा महोत्सव में सेवा का विशेष अवसर देश विदेश में ज्ञान, भक्ति,धर्म संकिर्तन,सनातन संस्कृति के संवाहक के रुप में पहुंचाने वाले श्रीराधारमण लाल जू के अनन्य भक्त, जन के मन को प्रिय श्रद्धेय पुण्डरीक गोस्वामी जी महाराज के द्वारा किया गया था।जो कि बाल्यावस्था से ही अपना मनमीत ठाकुर जी को बना लिया.जिस उम्र में कोई बालक अपने मित्रों संह हंसी ठिठोली करता है उस उम्र में श्री पुण्डरीक गोस्वामी जी विश्व पटल पर श्रीमद्भागवत के माध्यम में भक्ति और वैराग्य का पाठ पढ़ाने लगे थे।शब्दों पर जितनी पकड़ आप श्री की हिन्दी में है,उतनी ही संस्कृत में है और संसार के सामने मजबूती से वेद,पुराण का प्रतिनिधित्व करने के लिए अंग्रेजी में भी आपकी उतनी ही मजबूत पकड़ है।जिसका परिणाम है कि जितने प्रेमी चाहने वाले उनते भारतीय हैं उतने ही विदेशी भी हैं।

 

प्रेम से बोलिए श्रीराधारमण लाल जू की जय

अगले लेख में और विस्तृत चर्चा क्रमश जारी रहेगी...जैसी श्रीराधारमण लाल जू की कृपा रहेगी दास पर...!

  (सभी फोटो महाराज श्री पुण्डरीक गोस्वामी जी के एफबी पेज से साभार)

 

http://sandeepaspmishra.blogspot.in/2018/01/blog-post.html

 

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