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जाने क्या है हिन्दू सनातन धर्म में ‘ संवत्सर ’ का महत्व,कैसे हुई शुरुआत

Friday, 23 March 2018 06:34

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संदीप कुमार  मिश्र: (संकलन) हिन्दू सनातन धर्म विश्व का सबसे अनूठा और प्राचीन धर्म है ।  अक्सर एक यक्ष  प्रश्न आपके ज़हन में उठता होगा कि आखिर ‘संवत्सर’ है क्या, और हमारे देश में इसे मनाने के पीछे क्या कारण है और इसकी आवश्यकता क्यो पड़ी।साथ ही संवत्सर मनाने की परंपरा, और उसका विधि विधान क्या है ?

इस संबंध में जैसा कि ब्रह्म पुराण में वर्णित है कि जगत पिता ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन ही की थी। ब्रह्माजी ने जब सृष्टि की रचना का कार्य आरंभ किया तो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ‘प्रवरा' तिथि घोषित किया। इसमें धार्मिक, सामाजिक, व्यवसायिक और राजनीतिक अधिक महत्व के जो भी कार्य आरंभ किए जाते हैं, सभी सिद्धफलीभूत होते हैं।  

चैत्र मासि जगत ब्रह्मा संसर्ज प्रथमेऽहनि,

शुक्ल पक्षे समग्रेतु तदा सूर्योदय सति।।

वहीं कालांतर में भगवान विष्णु के मत्स्यावतार का आविर्भाव और सतयुग की शुरुआत प्रारंभ भी इसी समय हुआ था।तभी से इश प्रवरा तिथि के महत्व को स्वीकार कर, भारत के सम्राट विक्रमादित्य ने भी अपने संवत्सर का आरंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही किया।जिसे आगे चलकर महर्षि दयानंद जी ने भी आर्य समाज की स्थापना इसी दिन की ।

 

इस दिन मुख्यतया ब्रह्माजी का व उनकी निर्माण की हुई सृष्टि के प्रधान देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षसों, गंधर्वों, ऋषि, मुनियों, मनुष्यों, नदियों, पर्वतों, पशुपक्षियों और कीटाणुओं का ही नहीं, रोगों और उनके उपचारों तक का पूजन किया जाता है। साथ ही संवत्सर पूजन, नवरात्र घट स्थापना, ध्वजारोहण, तैलाभ्याड्ं स्नान, वर्षेशादि पंचाग फल श्रवण, परिभद्रफल प्राशनन और प्रपास्थापन प्रमुख रुप से की जाती हैं।कहते हैं कि  इसका विधिपूर्वक पूजन करने से वर्ष पर्यन्त सुख-शान्ति, समृद्धि आरोग्यता बनी रहती है।

हिन्दू धर्म के सभी शुभ कार्यों में शामिल संवत्सर

हमारे देश भारतवर्ष का गौरवमयी इतिहास और हमारी सनातनी सभ्यता और संस्कृति में संवत्सर का विशेष महत्व सदियों से रहा है।हमारे यहां शुभ संस्कार, विवाह, मुंडन, नामकरण कथा-किर्तन संकल्प जैसे शुभ कार्यों में जप-तप, मंत्र जाप, यज्ञादि अनुष्ठानों के समय संवत,संवत्सर का प्रयोग प्रमुखता से किया जाता है।हमारे पवित्र और प्राचीन ऋग्वेद में लिखा गया है कि दीर्घतमा ऋषि ने युग-युगों तक तपस्या करके ग्रहों, उपग्रहों, तारों, नक्षत्रों आदि की स्थितियों का आकाश मंडल में ज्ञान प्राप्त किया। आपको ये भी बता दें कि वेदांग ज्योतिष काल गणना के लिए विश्व भर में भारत की सबसे प्राचीन और सटीक पद्धति है।

पौराणिक काल गणना वैवश्वत मनु के कल्प आधार पर सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग- इन चार भागों में विभाजित है। इसके पश्चात ऐतिहासिक दृष्टि से काल गणना का विभाजन इस प्रकार से हुआ। युधिष्ठिर संवत्, कलिसंवत्, कृष्ण संवत्, विक्रम संवत, शक संवत, महावीर संवत, बौद्ध संवत। तदुपरान्त हर्ष संवत, बंगला, हिजरी, फसली और ईसा सन भारत में चलते रहे। इसलिए वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, ज्योतिष और ब्रह्मांड संहिताओं में मास, ऋतु, वर्ष, युग, ग्रह, ग्रहण, ग्रहकक्षा, नक्षत्र, विषुव और दिन रात का मान व उनकी ह्रास, वृद्धि संबंधी विवरण पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं।

 

जानिए कैसे शुरू हुआ विक्रम संवत

ईसवी सन से ५७ वर्ष पहले उज्जैन के राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय ने आक्रांताशकों को पराजित कर विक्रमादित्य की उपाधि धारण की थी। यह चैत्र शुक्ला प्रतिपदा को घटित हुआ। विक्रमादित्य ने इसी दिन से विक्रम संवत की शुरुआत की। काल को देवता माना जाता है। संवत्सर की प्रतिमा स्थापित करके उसका विधिवत पूजन व प्रार्थना की जाती है।

 

एक दूसरे के पूरक हैं विक्रमी और शक संवत्सर

विक्रम और शक संवत्सर दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। यद्यपि हमारे राष्ट्रीय पंचांग का आधार शक संवत है, तथापि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि शक हमारे देश में हमलावर के रूप में आए थे। कालान्तर में भारत में बसने के उपरांत शक भारतीय संस्कृति में ऐसे रच बस गए कि उनकी मूल पहचान लुप्त हो गई। जो भी हो, पर शक संवत् के अनुसार हम न तो कोई राष्ट्रीय पर्व व जयंतियां मनाते हैं और ना ही लोक परंपरा के पर्व।

कहने का तात्पर्य यह है कि शक संवत् का हमारे दैनिक जीवन में कोई विशेष महत्व नहीं रह गया है। विक्रम संवत् के आधार पर तैयार किया गया पंचांग पूर्ण प्रचलन में है। भारत के सभी प्रमुख त्योहार व तिथियां इसी पंचाग के अनुसार मनाई जाती हैं। ज्ञात हो कि विक्रमी पंचांग ग्रेगेरिन कैलेंडर से ५७ वर्ष पहले वर्चस्व में आ गया था, जबकि शक संवत् की शुरुआत ईस्वी सन् के ७८ वर्ष बाद हुई।

विश्व में लगभग २५ संवतों का प्रचलन है जिसमें १५ तो २५०० वर्षों से प्रचलित हैं। दो-चार को छोड़कर प्रायः सभी संवत् वसंत ऋतु में आरंभ होते हैं। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को विक्रम संवत् का आरंभ भी भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप है क्योंकि इसका संबंध हमारे ऋतुचक्र से जुड़ा है। वृक्ष पुराने पत्ते झाड़कर नए धारण कर रहे हैं, प्रकृति भी पुष्पित वसंत में ‘झूम झूम कर सुगंधित वायु से इसका स्वागत करने को आतुर है।

 

ऐसे करें नव संवत्सर की शुरुआत

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नूतन संवत्सर प्रारंभ होता है। इस दिन प्रत्येक घर पर मंगल स्नान कर देवता, ब्राह्मण, गुरु की पूजा कर, स्त्रियां-शिशु वस्त्र आभूषण आदि धारण कर उत्सव मनाएं। ज्योतिषी का सत्कार कर उनसे नूतन संवत्सर का फल सुनें। प्रातःकाल में नीम के कोमल पत्ते और पुष्प लाएं। उनमें काली मिर्च, हींग, सेंधा नमक, अजवाइन, जीरा और खांड मिलाकर चूर्ण बनाएं, कुछ इमली भी मिलाएं और इसे खाएं। इस प्रयोग से साल भर रक्त विकार नहीं होता और अनेक रोगों की शांति होती है।

पंचागस्य गणेश, ब्राह्मण और ज्योतिषी की पूजा कर याचकों को यथाशक्ति दान आदि से प्रसन्न करें। मिष्ठान आदि भोजन कराएं। गीत, गायन, वाद्य, कथा श्रवण आदि कर यह संपूर्ण दिन आनंद से व्यतीत करें। गृहस्थियों को विलासयुक्त आनंदपूर्वक वर्षारंभ दिन व्यतीत करने से संपूर्ण वर्ष आनंदमय जाता है। (संकलन)

 

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